वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
तेनास्य रथनिर्घोषो नलस्येव महानभूत् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
तेनास्य सुमहद्युद्धं कुरुक्षेत्रे वभूव ह ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
तेनाहं त्वं यथा नाद्य त्वं चापि न यथा वय़म् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
तेनाहं पाण्डवांश्चैव पाञ्चालान्मत्स्यकेकय़ान् |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
तेनाहं प्रेषिता भ्रात्रा दुष्टभावेन रक्षसा |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
तेनाहं योद्धुमिच्छामि महाभागेन संय़ुगे |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
तेनाहं विप्र सत्येन स्वय़मात्मानमालभे ||
७१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
तेनाहं सह सङ्गम्य रतवान्सुचिरं वत |
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तेनाहं साङ्ख्यमुख्येन सुदृष्टार्थेन तत्त्वतः |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
११
नकुल उवाच
तेनाहमश्वेषु पुरा प्रकृतः शत्रुकर्शन ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तेनाहमिषुणा शल्य वासुदेवधनञ्जय़ौ |
६१ क
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
तेनाहमेवं कृशतां गतश्च; विवर्णतां चैव सशोकतां च ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तेनेन्द्रः सख्यमकरोत्समय़ं चेदमव्रवीत् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
तेनेन्द्रत्वं प्राप्य विभ्राजतेऽसौ; तस्माद्यज्ञे सर्वमेवोपय़ोज्यम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
७९
जनमेजय़ उवाच
तेनेन्द्रसमवीर्येण सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिना |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
तेनेन्द्राशनिमेघानां वीर्यौजस्तद्विनाशितम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तेनेषुवर्येण किरीटमाली; प्रहृष्टरूपो विजय़ावहेन |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
तेनेष्टं विविधैर्यज्ञैर्वहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
व्यास उवाच
तेनेष्ट्वा त्वं विपाप्मा वै भविता नात्र संशय़ः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तेनेय़ं पृथिवी दुग्धा सस्यानि दश सप्त च |
१२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
तेनेय़ं पृथिवी पूर्वं वैन्येन परिरक्षिता ||
८४ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
तेनैकं रथमास्थाय़ जैत्रं हेमविभूषितम् |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
तेनैकाग्रमनस्त्वेन प्रीतो भवति वै हरिः ||
३२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
तेनैकेन जिताः सर्वे मदीय़ा उग्रतेजसः |
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
भीष्म उवाच
तेनैकेन तु रक्षा वै विपुलेन कृता स्त्रिय़ाः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
तेनैकेन यथादिष्टं तथा वर्ताम भारत |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
तेनैतत्कथितं तात माहात्म्यं परमात्मनः |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तेनैतन्नाभिजानन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तेनैतन्नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् |
७६ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तेनैव क्रमय़ोगेन जिज्ञासुः पर्यपृच्छत ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
तेनैव च स कालेन प्रत्यवुध्यत वीर्यवान् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
तेनैव चाथ देहेन विचरन्ति दिशो दश ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
तेनैव त्वं धृतिमता श्रीमता चाभिसत्कृतः |
९ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तेनैव दृष्टपूर्वेण सादृश्येनोपसूचितम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
तेनैव देवाः प्रीय़न्ते सतां मार्गस्थितेन वै ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
तेनैव नाम्ना तं देशं वाच्यमाहुर्मनीषिणः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तेनैव प्राप्नुय़ात्प्राज्ञो हय़मेधफलं नरः ||
५० ग
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
तेनैव मङ्गलेनाशु सुदेवो यातु माचिरम् |
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
तेनैव रथमुख्येन तरुणादित्यवर्चसा |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन; सहस्रवाहो भव विश्वमूर्ते ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तेनैव वालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् |
११५ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तेनैवमुक्त उपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
९६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तेनैवमुक्त उपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
१७२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
तेनैवमुक्तः प्रहसन्महात्मा; दुर्योधनं जातमन्युं विदित्वा |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
तेनैवमुक्तस्तमहं प्रत्यवोचं; प्राप्तोऽस्मि ते विषय़ं दुर्निवर्त्यम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तेनैवमुक्ता भ्रातरस्तस्य तथा चक्रुः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तेनैवमुत्को जनमेजय़स्तं प्रत्युवाच |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
तेनैवाद्येन धर्मेण व्रह्मा लोकविसर्गकृत् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
तेनैवान्यः प्रभवति सोऽपरं वाधते पुनः |
१८ क