chevron_left  तेनैवामृतसिक्तश्चarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
तेनैवामृतसिक्तश्च पुनः सञ्जीवितो वकः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
तेनैवाहं प्रसङ्गेन द्रष्टुमिच्छामि भार्गवम् ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ४६
द्रोण उवाच
तेनैवाहं प्रसन्नो वै परमत्र विधीय़ताम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
तेनैवोपेन्धनो नूनं दावो दहति दारुणः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
तेनैषा प्रथिता व्रह्मन्मर्यादा लोकभाविनी |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
तेनोक्ता दिक्षु सर्वासु सर्वे मार्गत वाजिनम् ||
११ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
तेनोच्छिष्टेन गात्राणि शिरश्चैवाभ्यमृक्षय़म् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तेनोत्तमास्त्रेण ततो महात्मा; सर्वाण्यनीकानि महाधनुष्मान् |
१११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
तेनोत्सृष्टा चक्रय़ुक्ता शतघ्नी; समं सर्वांश्चतुरोऽश्वाञ्जघान |
४६ क
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
तेनोपमन्त्र्यमाणाय़ा वधार्हेण सपत्नहन् |
९ क
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
तेनोपाय़ेन काकुत्स्थः सेतुवन्धमकारय़त् |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तेनोरसि महावाहुर्भीमसेनमताडय़त् ||
४ ग
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
तेनोषितास्मि भद्रं ते स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
तेभ्य एव तु तत्सर्वं कृत्यया विसृजाम्यहम् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ३
नकुल उवाच
तेभ्य एवं प्रवक्ष्यामि विहरिष्याम्यहं यथा ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
तेभ्य एवाभ्यनुज्ञातं तत्तदा मधुसूदन ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
तेभ्यः परम्परा राजन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ||
३४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
तेभ्यः पवित्रमाख्येय़ं भूमिदानमनुत्तमम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वासुदेव उवाच
तेभ्यः पितेव पुत्रेभ्यो राजन्व्रूहि परं नय़म् |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
तेभ्यः पूजां प्रय़ुञ्जीथा व्राह्मणेभ्यः परन्तप |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
तेभ्यः प्रतिजुगुप्सेथा जानीय़ाः समय़च्युतान् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
तेभ्यः प्रतिज्ञाय़ नलः करिष्य इति भारत |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
तेभ्यः प्रसूतास्तेष्वेव महाभूतेषु पञ्चसु |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
तेभ्यः प्राचेतसो जज्ञे दक्षो दक्षादिमाः प्रजाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
तेभ्यः प्रय़च्छ दानानि ये प्रवृत्ता नराधिप |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
तेभ्यः प्रय़ुज्य तां पूजां प्रोवाच मधुसूदनः |
६३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
ऋषय़ ऊचुः
तेभ्यः शशंस धर्मात्मा याथातथ्येन वुद्धिमान् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
तेभ्यः शशंसुर्धर्मज्ञा याथातथ्यं पितामह ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेभ्यः स ददृशे धीमाँल्लोकेभ्यः पशुय़ाजिनाम् |
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
तेभ्यः सङ्कल्पिता भागाः स्वय़मेव स्वय़म्भुवा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
तेभ्यः सर्वेभ्य एवाहुर्भय़ं राजोपसेविनाम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
तेभ्यः सृजति भूतानि काल आत्मप्रचोदितः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
तेभ्यश्च प्रददौ वित्तं शतशोऽथ सहस्रशः ||
११ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तेभ्यश्चाक्षिसहस्रेभ्यः प्रादुरासन्महार्चिषः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
व्राह्मण उवाच
तेभ्यश्चान्यांस्तेष्वनित्यांश्च भावा; न्भूतात्मानं लक्षय़ेय़ं शरीरे |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तेभ्यश्चान्ये गताः पूर्वं राजानो वलवत्तराः |
१७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
तेभ्यस्तच्छ्रावय़ामास पुराणं वेदसंमितम् ||
१०६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
तेभ्यस्तन्न तदाख्येय़ं स धर्म इति निश्चय़ः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
तेभ्यस्तु लेभिरे गर्भान्क्षत्रिय़ास्ताः सहस्रशः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
तेभ्यो द्वे द्वे शते क्रीत्वा प्राप्तास्ते पार्थिवैस्तदा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
जनमेजय़ उवाच
तेभ्यो धन्यतरश्चैव नारदः परमेष्ठिजः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
तेभ्यो नमश्च भद्रं च ये शरीराणि जुह्वति |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
तेभ्यो नाराय़णनरौ तपस्तेपतुरव्ययौ |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
तेभ्यो न्यवेदय़ं पुत्र प्रतिज्ञां पितृगौरवात् |
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय १३४
वैशम्पाय़न उवाच
तेभ्यो भक्ष्यान्नपानानि शय़नानि शुभानि च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
तेभ्यो महोदधिश्चैनं प्राप्तवान्धर्ममुत्तमम् |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
तेभ्यो मोक्षाः सप्त भवन्ति दीक्षा; गुणाः फलान्यतिथय़ः फलाशाः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
तेभ्यो यथार्हमन्नानि पानानि विविधानि च ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
तेभ्यो रत्नं हिरण्यं वा गामश्वान्वा ददाति यः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
तेभ्यो राजसहस्रेभ्यस्तद्विद्धि भरतर्षभ ||
६० ख