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उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
ततः प्रनष्टे देवेन्द्रे व्रह्महत्याभय़ार्दिते |
४४ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततः प्रनृत्तमासाद्य हर्षाविष्टेन चेतसा |
१०२ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रभग्नं तत्सैन्यं दौर्योधनमरिन्दम ||
६४ ग
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रभग्ना सहसा महाचमूः; सा पाण्डवी तेन नराधिपेन |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रभद्रका राजन्सोमकाश्च सहस्रशः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रभातसमय़े द्रोणं दुर्योधनोऽव्रवीत् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रभातसमय़े राजन्कर्णस्य दैवतैः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
ततः प्रभातसमय़े विकृतः कृष्णपिङ्गलः |
१०९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
ततः प्रभातसमय़े सुखं पृष्ट्वाव्रवीदिदम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४४
भीष्म उवाच
ततः प्रभातसमय़े सोऽतिथिस्तेन पूजितः |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभाते राजा स धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
ततः प्रभाते राजेन्द्र सूर्ये विमल उद्गते |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभाते विमले द्विजर्षभा; वचोऽव्रुवन्धर्मसुतं नराधिपम् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभाते विमले धार्तराष्ट्रेण चोदिताः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रभाते विमले सूर्यस्योदय़नं प्रति |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभाते विमले स्थिता दिष्टस्य शासने |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रभाते विमले स्वेनानीकेन वीर्यवान् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
ततः प्रभामय़ी देवी शरीरात्तस्य निर्ययौ |
५४ क
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभासे न्यवसन्यथोद्देशं यथागृहम् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभिन्नेन महागजेन; महीधराभेन पुनर्विकर्णः |
७ क
वन पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभुस्त्रिदिवनिवासिनां वशी; महामतिर्गिरिश उमापतिः शिवः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभृति चाद्यापि यष्ट्याः क्षितिपसत्तमैः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
ततः प्रभृति चाद्यापि शव्दानुच्चारितान्पृथक् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २९३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभृति चाप्यन्ये प्राभवन्नौरसाः सुताः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ३५
सूत उवाच
ततः प्रभृति तां कन्यां वासुकिः पर्यरक्षत |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रभृति तां कृत्यामपश्यन्द्रौणिमेव च ||
६७ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभृति ये केचिदज्ञानात्तां पुरीं नृपाः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रभृति रक्षांसि तत्र सौम्यानि भारत |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
ततः प्रभृति लोकेषु जृम्भिका प्राणिसंश्रिता ||
४८ ग
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
ततः प्रभृति लोकेऽस्मिन्पूज्यः सर्वधनुष्मताम् |
८३ क
वन पर्व
अध्याय २३०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रमथ्य गन्धर्वांस्तद्वनं विविशुर्वलात् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
ततः प्रमद्वरेत्यस्या नाम चक्रे महानृषिः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रमुच्य कौन्तेय़ं द्रोणो द्रुपदवाहिनीम् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रमुदितं सर्वं वलमासीद्विशां पते |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रमुदितः सर्वो जनस्तद्वनमञ्जसा |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रमुदिता योधाः परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रमुदिताः पार्थाः परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् |
३५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रमृज्य साश्रूणि पुत्रान्वचनमव्रवीत् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्ररुदितान्सर्वान्निशम्याथ सुतस्तय़ोः |
२० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्ररुरुदुः सर्वाः स्त्रिय़ो दृष्ट्वा नरर्षभान् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
ततः प्रलीने सर्वस्मिन्भूते स्थावरजङ्गमे |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२५
व्यास उवाच
ततः प्रलीने सर्वस्मिन्स्थावरे जङ्गमे तथा |
२ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
ततः प्रवर्तते पश्चात्करणेष्वस्य सिद्धय़े |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
ततः प्रवर्तिता सम्यक्तपोविद्भिर्द्विजातिभिः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रववृते भीमः सङ्ग्रामो लोमहर्षणः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रववृते भूय़ः सङ्ग्रामो राजसत्तम |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रववृते भूय़ः सङ्ग्रामो लोमहर्षणः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रववृते यज्ञः प्रभूतान्नः सुसंस्कृतः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रववृते युद्धं कर्णस्य सह पाण्डवैः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रववृते युद्धं कुरुमाधवसिंहय़ोः |
३५ क