आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु भैक्षं प्रतिगृह्य कृष्णा; कृत्वा वलिं व्राह्मणसाच्च कृत्वा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
तेषां तु मनसा रश्मीन्यदा सम्यङ्निय़च्छति |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
तेषां तु युय़ुधानेन युध्यतां युधि भारत |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
तेषां तु रथमुह्यानां रथेषु विविधा ध्वजाः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तेषां तु रथसिंहानां मध्यं प्राप्य धनञ्जय़ः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
तेषां तु रथिनां मध्ये कौन्तेय़ौ रथिनां वरौ |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु वचनादेव प्रकृतिस्था सरस्वती |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तेषां तु वाजिनां भूमिः खुरैश्चित्रा विशां पते |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु विप्रकारेषु तेषु तेषु महामतिः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु शरवर्षाणि सव्यसाची परन्तपः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तेषां तु षट्सहस्राणि ये शिखण्डिनमन्वय़ुः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तेषां तुष्टो महादेव ऋषीणामुग्रतेजसाम् |
१२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तेषां तूत्साद्यमानानां पाञ्चालानां समन्ततः |
६१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तेषां ते क्षीरिणां क्षीरं पिवन्त्यमृतसंनिभम् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां ते मुनय़ः श्रुत्वा तुष्टुवुस्तां महानदीम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्राह्मणा ऊचुः
तेषां तेजस्तथा वीर्यं देवानां ववृधे ततः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
तेषां तेषां तथा हि त्वमाश्रमाणां ततस्ततः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
तेषां त्रय़ाणां चापानि चिच्छेद विशिखैस्त्रिभिः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
तेषां त्रय़ाणां विविधं विमर्शं; वुध्येत चित्तं विनिवेश्य तत्र |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
तेषां त्वत्तः प्रसूतानां कुलभेदो भविष्यति |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
जनमेजय़ उवाच
तेषां त्वय़ाभिनिर्दिष्टा पारम्पर्यागता गतिः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
शक्र उवाच
तेषां त्वय़ैकेन महात्मनास्मि; वुद्धस्तस्मात्प्रीतिमांस्तेऽहमद्य ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तेषां ददृशिरे कोपाद्वपूंष्यमिततेजसाम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
तेषां दमः पवित्राणि प्रलापा धर्मसंश्रिताः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
तेषां दर्पः समभवत्प्रजानां धर्मनाशनः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तेषां दशसहस्राणि रथानामनुय़ाय़िनाम् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तेषां दशसहस्राणि वभूवुर्दृढधन्विनाम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
तेषां दानवमुख्यानां प्रय़ुतान्यर्वुदानि च |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां दुर्योधनः श्रुत्वा तानि वाक्यानि भाषताम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां दुर्योधनो राजा ससैन्यानां महात्मनाम् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
तेषां दृष्ट्वा तु क्रुद्धानां वपूंष्यमिततेजसाम् |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय
५०
सूत उवाच
तेषां दृष्ट्वा भावितानीङ्गितानि; प्रोवाच राजा जनमेजय़ोऽथ ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तेषां देहान्विनिर्भिद्य शरास्ते निशितास्तदा |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तेषां द्रक्ष्यसि पाञ्चालि गात्राणि पृथिवीतले |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
तेषां द्रुपदपौत्राणां त्रय़ाणां निशितैः शरैः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
तेषां द्विपानां विचकर्त पार्थो; वर्माणि मर्माणि करान्निय़न्तॄन् |
६० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तेषां धनूंषि ध्वजवाजिसूतां; स्तूणं पताकाश्च निकृत्य वाणैः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
तेषां धर्मफलावाप्तिर्योऽन्यथा स विमुह्यति ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
तेषां धर्ममय़ी वाणी सर्वेषां श्रोत्रमागमत् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
तेषां धर्मान्यथापूर्वं मनुः स्वाय़म्भुवोऽव्रवीत् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां चत्वारः प्रधाना वभूवुर्दुर्योधनो दुःशासनो विकर्णश्चित्रसेन इति ||
६२ क
वन पर्व
अध्याय
२५४
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां ध्वजाग्राण्यभिवीक्ष्य राजा; स्वय़ं दुरात्मा कुरुपुङ्गवानाम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
तेषां न च रजो वस्त्रं वाधते तत्र वै मुने ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तेषां न चाल्यते वुद्धिरात्मार्थं कृतनिश्चय़ा ||
१७५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां न तावन्निर्वृत्तं वर्तते तु त्रय़ोदशम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
तेषां न तिर्यग्गमनं हि दृष्टं; नावाग्गतिः पापकृतां निवासः |
१०८ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
तेषां न धर्मजं किञ्चित्प्रेत्य शर्मास्ति कर्म वा ||
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां नात्मनिनो युद्धे नापय़ानेऽभवन्मतिः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तेषां नानद्यतां चैव शस्त्रवृष्टिं च मुञ्चताम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
तेषां नान्यदृते लोके तपसः कर्म विद्यते ||
३७ ख