उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
तेषां यदुर्महातेजा ज्येष्ठः समभवत्प्रभुः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
तेषां यद्यद्भवेद्युक्तं संनिपाते क्वचित्क्वचित् |
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
तेषां यावत्तिथं यद्यत्तत्तत्तावद्गुणं स्मृतम् ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
तेषां युद्धं तु पापिष्ठं वेदय़न्ति पुराविदः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
तेषां युद्धं समभवद्दारुणं शोणितोदकम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां युधिष्ठिरो राजा पूजां चक्रे यथाविधि |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां युधिष्ठिरो राजा सर्वेषां पुरुषर्षभ |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
तेषां ये वेदवलिनस्त उत्थाय़ समन्ततः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
तेषां योजनविष्कम्भो द्विगुणः प्रविभागशः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
तेषां योनिं प्रवक्ष्यामि निय़तां पापकर्मणाम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
तेषां रथानामथ पृष्ठगोपा; द्वात्रिंशदन्येऽव्यपतन्त पार्थम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तेषां रथाश्च नागाश्च प्रवराश्चापि पत्तय़ः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
तेषां राजसहस्राणां हय़ानां दन्तिनां तथा |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
तेषां रुदितशव्देन गृध्रोऽभ्येत्य वचोऽव्रवीत् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां लक्षणमप्यासीन्महान्करपुटस्तथा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
युधिष्ठिर उवाच
तेषां लक्षणमेतद्धि यच्छ्वेतद्वीपवासिनाम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
तेषां लिङ्गानि वक्ष्यामि येषां समुदय़ो दमः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने व्रह्मणः स्मृताः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१४
भीष्म उवाच
तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने व्रह्मणा सह |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
तेषां लोकाः परतरे तान्यजन्तीह देवताः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां वचस्तत्तु निशम्य देवः; प्रहस्य रक्षांशि ततोऽभ्युवाच |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
तेषां वधः क्रिय़तां क्षिप्रमेव; तेषु प्रनष्टेषु जगत्प्रनष्टम् ||
२० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
तेषां वधार्थं भगवान्नरेण सहितो वशी |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
तेषां वधोऽतिपापीय़ान्किं नु युद्धेऽस्ति शोभनम् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६९
मार्कण्डेय़ उवाच
तेषां वलवतामासीन्महास्त्राणां समागमः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां वलविघातो हि कर्तव्यस्तात नित्यशः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तेषां वहुत्वाद्धि भृशं शराणां; दिशोऽथ सर्वाः पिहिता वभूवुः |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
तेषां वहुविधास्त्वन्यास्तत्र तत्र हि जातय़ः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
युधिष्ठिर उवाच
तेषां वाक्यानि गोविन्द श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तेषां वाणसहस्रौघैराकीर्णा वसुधाभवत् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां विंशतिसाहस्रा ध्वजाः शूरैरधिष्ठिताः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां विचरतां तत्र तत्तत्कर्म चिकीर्षताम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
तेषां विज्ञाननिष्ठानामन्यत्तत्त्वं न रोचते ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तेषां विदार्य चेतांसि शरा हेमविभूषिताः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
तेषां विदुरवाक्यानामुक्तानां दीर्घदर्शिनाम् |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
३४
व्रह्मो उवाच
तेषां विनाशो भविता न तु ये धर्मचारिणः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
तेषां विप्रतिषेधार्थं राजा सृष्टः स्वय़म्भुवा ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां विमुच्यमानानां धनुषामर्कवर्चसाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
तेषां विमृशतामेवं तत्तत्समभिधावताम् |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां विवादः सुमहाञ्जज्ञे शक्रमहर्षिणाम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भरद्वाज उवाच
तेषां विविधवर्णानां कुतो वर्णविनिश्चय़ः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७७
युधिष्ठिर उवाच
तेषां विशेषमाचक्ष्व व्राह्मणानां पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
तेषां विष्णुर्वामनोऽभूद्गोविन्दश्चाभवत्प्रभुः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
तेषां वीर्यं ममार्धेन न तुल्यमिति लक्षय़े ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां वृत्त्यर्थिनां तत्र वसतां हिमवद्वने |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
तेषां वृद्ध्याभिवृद्धिर्नो मा क्रुधः पुरुषर्षभ ||
१६ ख