उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामनुमतं ज्ञात्वा राजा दुर्योधनस्तदा |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
यतिरु उवाच
तेषामनुमतं श्रुत्वा शक्या कर्तुं विचारणा ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
तेषामनेकैरेकैकं कर्णो विव्याध चाशुगैः ||
१०३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
तेषामन्तकरं युद्धं देहपाप्मप्रणाशनम् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तेषामन्तरविष्कम्भो द्विगुणः प्रविभागशः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामन्तरविष्कम्भो योजनानि सहस्रशः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
तेषामन्तर्गतं ज्ञात्वा देवानां स पितामहः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
तेषामन्यतमं देवं पतिं वरय़ शोभने ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
तेषामन्यतमं देवं पतित्वे वरय़स्व ह ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामन्यतमो यस्तु चतुर्थः परिकीर्तितः |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
तेषामन्यतमोत्सेके विधानमुपदिश्यते ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामन्यतमोत्सेके विधानमुपदिष्यते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
तेषामन्यतरापत्तौ यद्यदेवोपसेवते |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
तेषामन्योन्यभक्षाणां सर्वेषां देहचारिणाम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
तेषामन्योन्यभिन्नानां स्वशक्तिमनुतिष्ठताम् |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामन्योन्यसंमर्दादूष्मेव समजाय़त |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तेषामन्योन्यसुहृदां कृते कर्मणि दुष्करे |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
तेषामपचितिश्चैव मय़ा कार्या न संशय़ः |
७७ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामपरिमेय़ानि नामधेय़ानि सर्वशः |
१०६ क
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
तेषामपि गुणाः सर्वे गुणवृत्तिः परस्परम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
तेषामपि तु वाणास्ते वहुत्वाच्छलभा इव |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामपि परां पूजां चक्रे भीमो महाभुजः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
तेषामपि भवेद्धर्म उपभोगेन भक्षणात् |
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामपि महामेरुः स्थानं शिवमनामय़म् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामपि महावाहो कर्माणि परिचिन्तय़ |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामपि महावाहो साहाय़्यं मधुसूदन |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तेषामपि महोत्सेधाः शोभय़न्तो रथोत्तमान् |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामपि यथान्याय़ं पूजां चक्रे महामनाः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तेषामपि वलं सर्वं हतं दुर्योधन त्वय़ा |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
उमो उवाच
तेषामपि विधिं पुण्यं श्रोतुमिच्छामि शङ्कर |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामपि श्रीनिमित्तं महानासीत्समुच्छ्रय़ः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
तेषामपि समुद्रान्ता पितृपैतामही मही ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
तेषामपि हताः शूराः शतशोऽथ सहस्रशः ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
तेषामपि ह्यधर्मेण चेष्टितं शृणु यादृशम् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
तेषामपीदं प्रपितामहानां; राज्यं पितुश्चैव कुरूत्तमानाम् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
तेषामपीदृशं कर्म न किञ्चिदनुशुश्रुम ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
तेषामपेततृष्णानां निर्णिक्तानां शुभात्मनाम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
तेषामप्यधमो राजन्कृतघ्नो मित्रघातकः |
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
तेषामप्यभवत्पुत्रः समानो नाम दुर्जय़ः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
तेषामप्यवधः कार्यः किं पुनर्ये स्युरीदृशाः ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामभिव्याहरतां शस्त्रवर्षं च मुञ्चताम् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
तेषामभूद्दुःखमतीव कृष्णां; दृष्ट्वा सभाय़ां परिकृष्यमाणाम् ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
तेषामभ्यधिका मासाः पञ्च द्वादश च क्षपाः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
तेषामभ्यस्यतां तत्र सर्वेषां सव्यदक्षिणम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामभ्यस्यतां वेदान्कदाचित्संशय़ोऽभवत् |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामभ्यागतानां स राजा राजीवलोचनः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
तेषाममृतवीर्याणां रसानां पय़सैव च |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
कृप उवाच
तेषामर्थे महाराज योद्धव्यमिति मे मतिः |
६७ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
तेषामर्थेऽभिय़ाचामि त्वामहं वै महानदि ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
तेषामल्पतरो धर्मः कामभोगमजानताम् ||
८२ ख