आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामवरजो भीष्मः कुरूणामभय़ङ्करः |
६९ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामवरजो विष्णुर्यत्र लोकाः प्रतिष्ठिताः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
तेषामष्टादशो देही यः शरीरे स शाश्वतः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तेषामष्टौ महानागांश्चतुःषष्ट्या सुतेजनैः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
तेषामस्त्राणि सर्वेषामुत्तमास्त्रविदां वरः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
तेषामस्थिरवुद्धीनां लुव्धानां कामचारिणाम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तेषामहं पञ्च शतानि हत्वा; ततो द्रौणिमगमं पार्थिवाग्र्य ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
तेषामहं भय़ाद्राजन्गमिष्याम्यन्यमाश्रमम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
तेषामहं विमूढानामन्योन्यमभिधावताम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
५३
नल उवाच
तेषामहं संनिधौ त्वां वरय़िष्ये नरोत्तम |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामाकारभावज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामागच्छतां रात्रौ पथिस्थाने वृकोऽभवत् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
जनमेजय़ उवाच
तेषामाजननं पुण्यं कस्य न प्रीतिमावहेत् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०९
जनमेजय़ उवाच
तेषामाजननं सर्वं वैशम्पाय़न कीर्तय़ ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
तेषामादत्त तेजांसि जलं सूर्य इवांशुभिः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
तेषामाददतः प्राणानासीदाधिरथेर्वपुः |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
तेषामादित्यचन्द्राभाः कनकोत्तमभूषणाः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशय़ति तत्परम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
तेषामादित्यवर्णानि विमलानि महान्ति च |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
तेषामादित्यवर्णाभा मरीच्यः प्रचकाशिरे ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
तेषामाधिरथिः क्रुद्धो यतमानान्मनस्विनः |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां केतून्रथांश्चापानि साय़कान् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां क्षिप्रं सुतानां ते नराधिप |
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां घोरस्तुमुलः समजाय़त |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
तेषामापततां चित्रान्ध्वजान्हेमपरिष्कृतान् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां तत्र शरवर्षाणि मुञ्चताम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां तत्र संहृष्टानां परस्परम् |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां तूर्णं गाण्डीवप्रेषितैः शरैः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां तूर्णं पुत्रस्ते भरतर्षभ |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां राजन्सङ्क्रुद्धानाममर्षिणाम् |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां वीरः पूर्वं शीघ्रमथो दृढम् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां वेगमविषह्य महात्मनाम् |
६८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां शव्दः शुश्रुवे फल्गुनं प्रति |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां शव्दस्तीव्र आसीद्विशां पते |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां शीघ्रं गाण्डीवप्रेषितैः शरैः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां शूरः पाञ्चालानां तरस्विनाम् |
९९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां श्रुत्वा शव्दं तं तावकं वलम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
तेषामापततामेव शिलाय़ुद्धं चिकीर्षताम् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामाभरणान्याशु त्वरितानां विमुञ्चताम् |
१५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामाभरणान्येते गृध्रगोमाय़ुवाय़साः |
३४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तेषामार्तस्वरं श्रुत्वा वित्रस्ता गजवाजिनः |
८९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तेषामार्ताय़नमभूद्भीष्मः शन्तनवो रणे ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
तेषामावसथांश्चक्रुर्धर्मराजस्य शासनात् |
४७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तेषामाशु प्रय़ातानां रथानां तत्र वेगिनाम् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
तेषामासज्य गेहेषु काल्य एव स गच्छति ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
तेषामासीद्व्यतिक्षेपो गर्जतामितरेतरम् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
तेषामासीन्महाञ्शव्दस्ताडितानां च सार्वशः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तेषामासीन्महाराज व्यतिक्षेपः परस्परम् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
तेषामाहन्यमानानां वाणतोमरवृष्टिभिः |
४२ क