वन पर्व
अध्याय
२५१
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णा तस्मादपाक्रामद्देशात्सभ्रुकुटीमुखी ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
कृष्णा तु द्रौपदी कृष्णं तिर्यक्सासूय़मैक्षत |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
कृष्णा त्वेतत्कर्म चकार शुद्धं; सुदुष्करं तद्धि सभां समेत्य |
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णा दाशार्हमासीनमव्रवीच्छोककर्षिता ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णा निर्मांसवक्त्राश्च दीर्घपृष्ठा निरूदराः |
९२ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णा ममैषेत्यभिभाषमाणा; नृपासनेभ्यः सहसोपतस्थुः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
कृष्णा रक्ताम्वरधरा रक्तनेत्रतलान्तरा |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णा राजानमासाद्य शोकार्ता न्यपतद्भुवि ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
कृष्णाँल्ललामांश्चमराञ्शुक्लांश्चान्याञ्शशिप्रभान् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
८
द्रौपद्यु उवाच
कृष्णां च भार्यां पाण्डूनां कुरूणामेकसुन्दरीम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णां दद्यामिति सदा न चैतद्विवृणोति सः ||
८ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णां निपतितां दृष्ट्वा सहदेवं च पाण्डवम् |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णां नु शोचामि कथं न साध्वीं; शोकार्णवे साद्य विनङ्क्ष्यतीति |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णां पाञ्चालीमव्रवीत्सान्त्वपूर्वं; विमृश्यैतत्प्रज्ञय़ा तत्त्ववुद्धिः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
कृष्णां हृतां पश्यतां सर्वराज्ञां; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
कृष्णाः कनकगौर्यश्च नार्यः श्यामास्तथापराः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
कृष्णाः शौचपरिभ्रष्टास्ते द्विजाः शूद्रतां गताः ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
कृष्णाः श्वेताश्च तं वृक्षं कुट्टय़न्ति स्म मूषकाः ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
कृष्णाक्षाँल्लोहिताक्षांश्च निर्वर्त्स्यामि मनोरमान् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
कृष्णाजाजी विडश्चैव शीतपाकी तथैव च |
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाजिनं तथा व्रह्मा व्रह्मण्याय़ ददौ प्रभुः |
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
कृष्णाजिनानि परिधित्समाना; न्दुःशासनः कटुकान्यभ्यभाषत् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
कृष्णाजिनानि शक्तीश्च त्रिशूलान्याय़ुधानि च |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाजिनी दण्डपाणिः क्षौमवासाः स धर्मजः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
कृष्णाजिनेन संवीतं ददर्श पितरं वने ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं ददर्श मुनिमन्तिके |
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं नागय़ज्ञोपवीतिनम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गानव्रवीच्च युधिष्ठिरम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
कृष्णाजिनोत्तरीय़ाय़ कृष्णाष्टमिरताय़ च ||
१५२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाजिनोपसंवीतो हृताभरणभूषणः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
दुर्योधन उवाच
कृष्णादभ्यधिको यन्ता देवेन्द्रस्येव मातलिः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णादर्शनतुष्ट्यर्थं सर्वतः समुपाविशन् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाद्वा देवकीपुत्रात्फल्गुनाद्वा परन्तपात् |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
कृष्णाद्वा देवकीपुत्रात्सत्यं चात्र शृणुष्व मे ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
कृष्णानां मुखपुण्ड्राणामृक्षाणां भीमकर्मणाम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
कृष्णानां श्वेतवत्सानां सहस्राणि चतुर्दश |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णानिमित्तं विनिवृत्तभावं; राज्ञां तदा मण्डलमार्तमासीत् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णान्भङ्गीमतः केशाञ्श्वेतेनोद्ग्रथ्य वाससा |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
कृष्णान्सितांश्चैव विवर्तय़न्त्यौ; भूतान्यजस्रं भुवनानि चैव ||
१५१ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
कृष्णानय़नदृष्टश्च व्यवर्धत वृकोदरः ||
५५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णापि सर्वान्भ्रातॄंस्तान्निरीक्षन्ती तपस्विनी |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाभ्यां रक्षितं दृष्ट्वा तं च दावमहङ्कृताः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णामपि च पाञ्चालीं सर्वाः कुरुवरस्त्रिय़ः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णामादाय़ सङ्गत्या तस्थावाश्रित्य पादपम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
कृष्णार्जुनसमः कार्ष्णिः शक्रसद्म गतो ध्रुवम् ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
कृष्णार्जुनाभ्यां वीराभ्यामनुमन्य ततः प्रिय़म् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णार्थे कल्पितं तत्र धृतराष्ट्रस्य शासनात् ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
कृष्णावदातस्य सतः प्रिय़त्वाद्वालकस्य वै ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
कृष्णावेकरथे यत्तावधिज्यं गाण्डिवं धनुः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
कृष्णाश्रय़ाः कृष्णवलाः कृष्णनाथाश्च पाण्डवाः |
२३ क