द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तैः शिरोभिर्मही कीर्णा वाहुभिश्च सहाङ्गदैः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
मार्कण्डेय़ उवाच
तैः शूलहस्तैर्वध्यमानः स राजा; प्रोवाचेदं वाक्यमुच्चैस्तदानीम् ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
तैः सङ्गम्य नृपार्थाय़ यतितव्यं यथातथम् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
तैः सत्कृतः स च तानाजमीढो; यथोचितं पाण्डुपुत्रान्समेय़ात् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तैः समन्तात्परिवृतः कुञ्जरैः पर्वतोपमैः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
तैः समेत्य यथान्याय़ं कुरुभिः कुरुसंसदि |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
तैः समेत्य विनिश्चित्य सोऽनुज्ञातो महीपते |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
तैः समेत्यार्चितस्तान्स प्रत्यर्च्य च यथाविधि |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
तैः समेष्याम कौन्तेय़ यत्तो विक्रमणे भव ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
तैः सम्प्रय़ुक्तः स महारथाग्र्यै; र्गङ्गासुतः समरे चित्रय़ोधी |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तैः सम्यगस्तैर्वलिना कृतिना चित्रय़ोधिना |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
दुर्योधन उवाच
तैः सहेमामुपाश्नीय़ां जीवञ्जीवैः पितामह ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तैः सार्धं नृपतिं वृद्धं ततस्तं पर्युपासताम् ||
३० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
तैः सार्धं मन्त्रय़ेथास्त्वं नात्यर्थं वहुभिः सह |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तैः साय़कैर्मोहितं वीक्ष्य शल्यं; भीमः शरैरस्य चकर्त वर्म |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
तैः स्फुरद्भिर्महाराज शुशुभे लोहितोक्षितैः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तैः स्फुरद्भिर्मही भाति रक्ताङ्गुलितलैस्तदा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
तैक्ष्ण्यं जिह्मत्वमादान्त्यं सत्यमार्जवमेव च |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
तैजसं रूपमास्थाय़ दावं दग्धुं प्रचक्रमे ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तैजसं वै विरजसं सोऽसृजन्मानसं सुतम् ||
९४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
तैजसानि शरीराणि भवन्त्यत्रोपपद्यताम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
तैजसी महती दीप्ता देवेभ्यश्च शिवा तनुः |
९६ क
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
तैजसी सा सभा राजन्वभूव शतय़ोजना |
२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
तैरप्ययं जितो लोकः कच्चित्पुरुषसत्तमैः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
तैरप्रमत्तः कुशलः सदश्वै; र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वै; र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तैरर्जुनस्य समरे किरीटं परिवर्तितम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
तैरर्द्यमानः सौभद्रः सर्वतो निशितैः शरैः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
तैरर्द्यमानोऽतिरथः सात्वतः शस्त्रकोविदः |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
कर्ण उवाच
तैरल्पैर्वहवो यूय़ं क्षय़ं नीताः प्रहारिणः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
तैरश्मचूर्णैर्दीप्यद्भिः खद्योतानामिव व्रजैः |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तैरस्तमुच्चावचमाय़ुधौघ; मेकः प्रचिच्छेद किरीटमाली |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
धृतराष्ट्र उवाच
तैरस्य पुरुषव्याघ्रैर्भृशमुद्वेजितं मनः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
तैरहं मोहय़िष्यामि पाण्डवान्व्येतु ते ज्वरः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
तैरहं समरे वीर त्वामाय़द्भिर्जय़ैषिभिः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
तैराख्याता भवतां यज्ञभूमिः; समीक्ष्य चैनां त्वरितमुपागतोऽस्मि |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
तैराख्यातेन मार्गेण ततस्ते प्रय़युस्तदा |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
तैराहतास्ते शरशक्तिशूलै; र्गदाभिरुग्रैः परिघैश्च दीप्तैः |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
तैराहतौ सर्वमनुष्यमुख्या; वसृक्क्षरन्तौ धनदेन्द्रकल्पौ |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
तैरिष्टः पञ्चकालज्ञैर्हरिरेकान्तिभिर्नरैः |
४२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
तैरिय़ं पुरुषव्याघ्रैर्विद्यावाहुवलान्वितैः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तैरिय़ं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा |
७० क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनी |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
तैरेकमतिभिर्भूत्वा यत्प्रोक्तं शास्त्रमुत्तमम् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
तैरेव ताडय़ामास सुवलस्यात्मजान्रणे ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
तैरेव न विजानाति प्राणमाहारसम्भवम् ||
२३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
तैरेव फलपत्रैश्च स माठरमतोषय़त् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२२०
मार्कण्डेय़ उवाच
तैरेव रमते देवो महासेनो महावलः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
तैरेव सहितः सर्वैः प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत् ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
तैरेव सहितः सर्वैरनुरज्य च तान्नृपान् |
४ क