chevron_left  अभावाद्भावितेष्वेवarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
अभावाद्भावितेष्वेव तेभ्यश्च प्रभवन्त्यपि |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
अभि गत्वार्जुनं वीरं राजभिर्वहुभिर्वृतः |
४९ क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिकामस्तथैवान्य इत्येष त्रिविधो ग्रहः ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
यय़ातिरु उवाच
अभिकामां स्त्रिय़ं यस्तु गम्यां रहसि याचितः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
अभिक्रन्दे नृवीराणां तदासीत्सङ्कुलं महत् ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अभिक्रुद्धस्य क्रुद्धस्तु ताडय़ामास तां गदाम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिक्रुद्धानभिप्रेक्ष्य गन्धर्वानर्जुनस्तदा |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
अभिक्रोशन्ति भूतानि अन्तरिक्षे विशां पते |
२० क
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अभिख्यातकुलैर्वीरैर्दृष्टवीर्यैश्च संय़ुगे ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिगच्छ महादेवं पितरं त्रिपुरार्दनम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४५
भीष्म उवाच
अभिगच्छन्क्रमेण स्म कञ्चिन्मुनिमुपस्थितः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगच्छन्ति तत्तीर्थं पुण्यं व्राह्मणसेवितम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
अभिगच्छन्ति राजेन्द्र चैत्रशुक्लचतुर्दशीम् ||
१३१ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिगच्छाव सुग्रीवं शैलस्थं हरिपुङ्गवम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
अभिगच्छावहे तं वै तस्यास्ति विभवो भुवि ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अभिगच्छेन्महादेवं विमानस्थं महावलम् |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
अभिगतजनवत्सला हि गङ्गा; भजति युनक्ति सुखैश्च भक्तिमन्तम् ||
१०० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
अभिगतमसुखार्थमीहनार्थै; रुपगतवुद्धिरवेक्ष्य चात्मसंस्थः |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्याय़तनानि च ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २३५
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य च तत्सर्वं शशंसुस्तस्य दुष्कृतम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अभिगम्य च तां देवीं न दुर्गतिमवाप्नुय़ात् ||
१४८ ख
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य च राजानं ज्ञापय़त्स्वं प्रय़ोजनम् |
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य च शर्मिष्ठां देवय़ान्यव्रवीदिदम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
अभिगम्य जय़ेय़ुस्ते तत्तेषां धर्मतो भवेत् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अभिगम्य ततस्तत्र वाजिमेधफलं लभेत् ||
८७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
अभिगम्य ततो देवा महेश्वरमथाव्रुवन् |
१४४ क
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य तदा राजन्निदं वचनमव्रुवन् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अभिगम्य तु दुर्धर्षः सहदेवो युधां पतिः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य तु योगेन भक्तिं भीष्मस्य माधवः |
६५ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अभिगम्य त्रिलोकेशं वरदं विष्णुमव्ययम् |
१०७ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य त्वराय़ुक्ताः श्लक्ष्णं वचनमव्रुवन् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
अभिगम्य दत्तं तुष्ट्या यद्धन्यमाहुरभिष्टुतम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य दाशराजानं कन्यां वव्रे पितुः स्वय़म् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य दुराधर्षं प्रव्याहारय़दच्युतः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अभिगम्य नरश्रेष्ठ स्वर्गलोके महीय़ते ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य पृथां क्षत्ता शनैः शोचन्निवाव्रवीत् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
अभिगम्य भृगोः पुत्रं च्यवनं संशितव्रतम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य महात्मानः पूजिताश्च यथाविधि |
६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अभिगम्य महादेवं मुच्यते सर्वकिल्विषैः ||
१४९ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अभिगम्य महादेवं वरदं विष्णुमव्ययम् |
१०९ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
अभिगम्य महादेवं विराजति यथा शशी ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
अभिगम्य महादेवमभ्यर्च्य च नराधिप |
६४ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
अभिगम्य महादेवमश्वमेधफलं लभेत् ||
१०८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य महाप्राज्ञः सञ्जय़ो वाक्यमव्रवीत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ९६
लोमश उवाच
अभिगम्य महाराज विषय़ान्ते सवाहनः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य महावाहुरभ्यगच्छन्महीपतिम् |
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
अभिगम्य यथान्याय़ं पाणिस्पर्शमथाचरत् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
अभिगम्य रणे मिथ्या पापेनोक्तः सुतं प्रति ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य व्यथाविष्टः कर्णस्तौ प्रत्यभाषत ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अभिगम्य श्रिय़ं राजन्विन्दते श्रिय़मुत्तमाम् ||
९३ ग