शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तौ परस्परवेगाच्च गदाभ्यां च भृशाहतौ |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तौ परस्परवेगाच्च शराभ्यां च भृशाहतौ |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
तौ पार्थिवानां मिषतां नरेन्द्र; कृष्णामुपादाय़ गतौ नराग्र्यौ |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
तौ पुनः संन्यवर्तेतां प्राणद्यूतपरे रणे |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
तौ पृथक्षरवर्षाभ्यामवर्षेतां परस्परम् |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
तौ पेततू रथोपस्थे रश्मीनुत्सृज्य वाजिनाम् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तौ पौत्रौ तव दुर्धर्षौ परस्परवधैषिणौ |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
तौ प्रगृह्य गदे भीमे तस्याः कामेन मोहितौ |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
तौ प्रगृह्य महावेगे धनुषी भीमनिस्वने |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
तौ प्रदक्षिणसव्यानि मण्डलानि महावलौ |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
तौ प्रसादय़ितुं गच्छ मा त्वा धर्मोऽत्यगान्महान् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
तौ प्रहस्य हृषीकेशं महावीर्यौ महासुरौ |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
तौ प्राकृतवदद्येमौ प्रसुप्तौ धरणीतले ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
तौ प्रय़ातौ पुनर्दृष्ट्वा तदान्ये सैनिकाव्रुवन् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
तौ प्रय़ुद्धौ रणे दृष्ट्वा वने वन्यौ गजाविव |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
तौ भिन्नगात्रौ प्रस्वेदं सुस्रुवाते जनाधिप |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
तौ मण्डलानि चित्राणि रथाभ्यां सव्यदक्षिणम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
तौ मन्निय़ोगाद्व्रह्मर्षे क्षितौ जातौ महाद्युती |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
तौ मुक्तौ सागरप्रख्याद्द्रोणानीकादरिन्दमौ |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तौ मुक्तौ साय़कौ ताभ्यां समं तत्र निपेततुः |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
तौ मुनी सर्वधर्मज्ञौ सर्वभूतहितैषिणौ |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तौ मुहूर्तं समाश्वस्य पुनरेव परन्तपौ |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
तौ मुहूर्तं समाश्वस्य पुनरेव परन्तपौ |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तौ यदा चरतः सार्धमथ लोकः प्रसीदति ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तौ यात्वा पुरुषव्याघ्रौ द्वारकां कुरुनन्दनौ |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
तौ युद्ध्वा विविधैर्घोरैराय़ुधैर्विशिखैस्तथा |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
तौ युध्यमानौ संरव्धौ मृत्युपाशवशानुगौ |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
तौ युध्यमानौ समरे भृशमन्योन्यविक्षतौ |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तौ रथस्थौ नरव्याघ्रौ भीष्मः शान्तनवः पुनः |
७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तौ रथस्थौ नरव्याघ्रौ राजानौ वृषकाचलौ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तौ रथात्सिंहसङ्काशौ लोहिताक्षौ महाभुजौ |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
तौ रथाभ्यां नरव्याघ्रौ दावस्योभय़तः स्थितौ |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
तौ रथाभ्यां महाराज मण्डलावर्तनादिषु |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
तौ रथावभिधावन्तौ समालोक्य महीक्षिताम् ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
तौ रथौ वीर्यसम्पन्नौ दृष्ट्वा सङ्ग्राममूर्धनि |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
तौ रथौ सम्प्रसक्तौ च दृष्ट्वा भारत पार्थिवाः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
तौ रथौ सूर्यसङ्काशौ योत्स्यमानौ महावलौ |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
तौ रथौ सूर्यसङ्काशौ वैय़ाघ्रपरिवारणौ |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तौ राजपुत्रौ त्वरितौ रथाभ्यां; कर्णाय़ यातावरिभिर्विमुक्तौ ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
तौ रात्रौ मामपश्यन्तौ कामवस्थां गमिष्यतः ||
८८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
तौ रौक्मिणेय़मागम्य वचोऽव्रूतां दिवौकसाम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
तौ लव्धसञ्ज्ञौ नृवरौ विशल्यावुदतिष्ठताम् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तौ वनेषु विचित्रेषु पर्वतानां च सानुषु ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तौ वा ममाद्य हन्तारौ हन्तास्मि समरे स्थितौ |
६९ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
तौ वाश्ववृषभौ भीष्म यौ न युद्धविशारदौ ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
तौ वाहू परिघप्रख्यौ पेततुर्गजसत्तमात् |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
तौ विक्षरन्तौ रुधिरं समासाद्येतरेतरम् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तौ विचेरतुरासाद्य गदाभ्यां च परस्परम् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
तौ विदार्य महासेनां प्रविष्टौ केशवार्जुनौ |
८८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
तौ विवादमनुप्राप्तौ शकुनौ मृत्युसन्धितौ |
१३ क