आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुत्रशतं सर्वं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८
सूत उवाच
ततः पुत्रसहस्रं तु कद्रूर्जिह्मं चिकीर्षती |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
ततः पुत्रसहस्राणि षष्टिं प्राप्स्यसि पार्थिव ||
२१ ख
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
ततः पुत्रांश्च पौत्रांश्च भ्रातॄनथ सखीनपि |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
ततः पुत्रार्थिणी देवी व्रीडिता सा तपस्विनी |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुत्रिणमात्मानं ज्ञात्वा पौरवनन्दनः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
ततः पुनः शरं दीप्तं सुप्रभं कालसंमितम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनः षोडशभिर्नतपर्वभिराशुगैः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुनः स गाङ्गेय़मभिवाद्य पितामहम् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुपाण्डवाः |
८४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुसृञ्जय़ाः |
१ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुनः समावृत्ताः पश्चिमां दिशमेव ते |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुनरतिक्रुद्धो राजा प्राग्ज्योतिषाधिपः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुनरथोवाच पर्यश्रुनय़नो हरिः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुनरनीकानि व्ययोजय़त वुद्धिमान् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनरपि द्रोणो नाम विश्रावय़न्युधि |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनरमेय़ात्मा केशवोऽर्जुनमव्रवीत् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनरमेय़ात्मा तव पुत्रो जनाधिपः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनरमेय़ात्मा धर्मराजस्य कार्मुकम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनरमेय़ात्मा नाराचान्दश पञ्च च |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनरमेय़ात्मा नाराचैर्निशितैस्त्रिभिः |
७० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनरमेय़ात्मा पुत्रस्ते पृथिवीपते |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनरमेय़ात्मा प्रसन्धाय़ शिलीमुखम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनरमेय़ात्मा भारद्वाजः प्रतापवान् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनरमेय़ात्मा शरवर्षं दुरासदम् |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
ततः पुनर्गताः स्वर्गं कृते कर्मणि शोभने ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनर्दक्षिणतः सङ्ग्रामश्चित्रय़ोधिनाम् |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुनर्भीमरवं प्रगृह्य; दोर्भ्यां महाशङ्खमुदारघोषम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमव्रवीत् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनर्महाराज मद्रराजमरिन्दमम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
ततः पुनर्वर्षशतं तप्त्वा तात्कालिकं महत् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनर्वस्तमुखैरश्मवृष्टिं समन्ततः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
ततः पुनस्तु राधेय़ो हय़ानस्य रथेषुभिः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुरं सुरपुरसंनिभद्युति; प्रविश्य ते यदुवृषपाण्डवास्तदा |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
ततः पुरन्दरं विष्णुरुवाच भुवनेश्वरम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
ततः पुरवरात्तस्मात्पुरुषाः श्वेतवेष्टनाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुरस्ताद्भगवान्निशाकरः; समुत्थितस्तामभिहर्षय़ंश्चमूम् |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुरात्स निष्क्रम्य रथी धन्वी शरी तली |
४ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुरीं द्वारवतीं प्रविश्य; जनार्दनः पितरं प्राह वाक्यम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां; सहस्रद्वारां शतय़ोजनाय़ताम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
ततः पुरुष उत्पन्नो रूपेणेन्द्र इवापरः ||
१०४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ततः पुरुषशार्दूलः सज्जः सज्जं पुरःसरः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
ततः पुरे च राष्ट्रे च वाहनेषु वलेषु च |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुर्या विनिष्क्रम्य वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
ततः पुष्करतः सृष्टः सर्वज्ञो मूर्तिमान्प्रभुः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
ततः पुष्करमालोक्य नलः परममन्युमान् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
ततः पुष्करमासाद्य वीरसेनसुतो नलः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
ततः पूर्णाय़तोत्सृष्टैः कृतवर्मा शिलाशितैः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
ततः पूर्णाय़तोत्सृष्टैः शरैः संनतपर्वभिः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
ततः पूर्णाय़तोत्सृष्टैः सात्वतं युद्धदुर्मदम् |
३६ क