अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
रन्तिदेवस्य यज्ञे ताः पशुत्वेनोपकल्पिताः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
रन्तिदेवाभ्यनुज्ञातो अग्निष्टोमफलं लभेत् ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
रन्तिदेवेन लोकेष्टा सिद्धिः प्राप्ता महात्मना |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
रन्तिदेवो हि नृपतिरपः प्रादादकिञ्चनः |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
रन्ध्र एषां विशेषेण वधकालः प्रशस्यते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
रन्ध्रागतमथाश्वानां शिखोद्भेदश्च वर्हिणाम् |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
रन्ध्रान्वेषी तव सदा त्वय़ा धृत्या वशीकृतः ||
७९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
रन्ध्रान्वेषी समुद्विग्नः सदाभूद्वलवृत्रहा ||
३२ ग
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
रमठान्हारहूणांश्च प्रतीच्याश्चैव ये नृपाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
मातलिरु उवाच
रमणीय़ं पुरं चेदं खचरं सुकृतप्रभम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
वदान्य उवाच
रमणीय़ं मनोग्राहि तत्र द्रक्ष्यसि वै स्त्रिय़म् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
रमणीय़ः समुद्देशो गङ्गातीरमिदं शुभम् |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३१
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़तरं लोके नगरं वारणावतम् ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१
अर्जुन उवाच
रमणीय़ानि गुप्तानि तेषां किञ्चित्स्म रोचय़ ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़ानि चित्राणि वनानि च सरांसि च |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़ानि पश्यन्तो वनानि विविधानि च |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
रमणीय़ानि यावन्ति यावदारम्भकाणि च |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़ान्वनोद्देशान्प्रेक्षमाणाः सरांसि च ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
रमणीय़ाश्च भूतानां निधानं च धृतव्रताः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
रमणीय़े कुरुक्षेत्रे पुण्ये स्वर्गं यिय़ासवः ||
२३ ग
आदि पर्व
अध्याय
१३१
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़े जनाकीर्णे नगरे वारणावते |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़े नदीकूले सहिताः समुपाविशन् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
रमणीय़े वने विप्र सर्वकामफलप्रदे ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़े वनोद्देशे गङ्गातीरे समे शुभे ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़े वनोद्देशे रममाणोऽर्जुनस्तदा |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
रमणीय़े शिलापृष्ठे सहितौ संन्यषीदताम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़े समाज्ञाते सोदके समहीरुहे |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़ेषु देशेषु ग्राहय़ामास वै मृगान् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२२८
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़ेषु देशेषु घोषाः सम्प्रति कौरव |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़ेषु देशेषु रत्नचित्राः स्वलङ्कृताः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़ेषु पुण्येषु सहितस्य त्वय़ानघ ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
रमणीय़ैर्वनोद्देशैस्तत्र तत्र विभूषितम् ||
३१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
रमण्यां च उपस्पृश्य तथा वै गन्धतारिके |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
रमते देवकन्यानां सहस्रैरय़ुतैस्तथा ||
९८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः ||
९२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः ||
९५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
रमते निन्दय़ा चैषां प्रशंसां नाभिनन्दति ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
रमते निर्हरन्स्तेनः परवित्तमराजके ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
रमते भगवांस्तत्र कुवेरानुचरैः सह |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
रमते सोऽर्च्यमानो हि सदा भागवतप्रिय़ः |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
रमते स्त्रीशताकीर्णे पुरुषोऽलङ्कृतः शुभे ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
रमत्ययं यथा स्वप्ने मनसा देहवानिव |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
शल्य उवाच
रमन्ते चोपहासेन पुरुषाः पुरुषैः सह |
८६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
रमन्ते पुण्यकर्माणस्तत्र नित्यं युधिष्ठिर |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
रमन्ते पुत्रपौत्रैश्च तेषां गतिरनुत्तमा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१४
भीष्म उवाच
रमन्ते पुत्रपौत्रैश्च तेषां गतिरनुत्तमा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
रममाणः श्रिय़ा कश्चिन्नान्यच्छ्रेय़ोऽभिमन्यते |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
रममाणस्तय़ा सार्धं यथाकामं जनेश्वरः |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
रममाणाः पुरे रम्ये लव्धभैक्षा युधिष्ठिर ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
रममाणौ यथाकामं यथैकदिवसं तथा ||
७ ग