chevron_left  तत्तमोऽस्त्रेणarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
तत्तमोऽस्त्रेण महता ज्योतिषेणार्जुनोऽवधीत् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
तत्तस्य कर्म भूतानि सर्वाण्येवाभ्यपूजय़न् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तत्तस्य चरितं दृष्ट्वा पौत्रस्तव विशां पते |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
तत्तस्य वचनं श्रुत्वा सम्यक्स पृथिवीपतिः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
तत्तस्य विस्मापय़नीय़मग्र्य; मपूजय़न्योधवराः समेताः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तस्य वेश्मार्थिजनोपशोभितं; विकीर्णपद्मोत्पलभूषिताजिरम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
तत्तस्यान्ये प्रशंसन्ति धर्मज्ञा नेतरे जनाः ||
५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भरद्वाज उवाच
तत्तस्यास्तु सदा पापं यस्ते हरति पुष्करम् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तारय़ति सन्तत्या पूर्वप्रेतान्पितामहान् ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
तत्तावच्छृणु यो देवैः सेन्द्रैः साग्निमरुद्गणैः |
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
तत्तु कर्म तथा कुर्याद्येन श्लाघेत संसदि |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
च्यवन उवाच
तत्तु कर्म समारव्धं दृष्ट्वेन्द्रः क्रोधमूर्छितः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तु ते कथय़िष्यामि नमस्कृत्वा स्वय़म्भुवे ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
तत्तु ते कारणं राजन्प्रवक्ष्याम्यनसूय़वे |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
तत्तु दत्तं हरेत्पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
तत्तु दास्यामि यत्कार्यमिदं सम्पादय़िष्यति |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
तत्तु दुर्योधनः श्रुत्वा द्रोणपुत्रस्य भाषितम् |
९४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तत्तु दुर्योधनः श्रुत्वा मन्त्रिभिर्मन्त्रय़िष्यति |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
तत्तु दृष्ट्वा महत्कर्म पुत्रस्य तव मारिष |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
तत्तु पश्यन्ति पुरुषा जितक्रोधा जितेन्द्रिय़ाः |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
तत्तु पार्थस्य विक्रान्तं वासुदेवस्य चोभय़ोः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
तत्तु भीमो महाराज कर्णस्य चरितं रणे |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
अम्वो उवाच
तत्तु भीष्मप्रसूतं मे तं जहीश्वर माचिरम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
तत्तु मर्षितमस्माभिर्भवतः प्रिय़काम्यया |
३ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तु राजा वचस्तेषां प्रतिगृह्य तपस्विनाम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तु वाक्यमनादृत्य सोऽर्थवन्मातृभाषितम् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
तत्तु विप्रहतं सैन्यं भीमसेनमुखैस्तव |
६७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तु शक्यं यथा तात रक्षितुं पाण्डुनन्दन |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
तत्तु शल्यमनिर्हृत्य कथं शक्ष्यामि जीवितुम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तु सर्वं यथान्याय़मुक्तं कुरुकुलोद्वहः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
तत्तु सर्वं यथावृत्तं धर्मराजेन भारत |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तत्ते कार्त्स्न्येन वक्ष्यामि शृणु राजन्समाहितः |
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
तत्ते तपः प्रवक्ष्यामि विद्वंस्तदपि मे शृणु ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५१
सूत उवाच
तत्ते दद्यां वरं विप्र न निवर्तेत्क्रतुर्मम ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तत्ते दास्यामि प्रीतात्मा मत्प्रसादो हि दुर्लभः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्ते धर्मं प्रवक्ष्यामि क्षात्रं राज्ञि सनातनम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
तत्ते वक्ष्यामि तत्त्वेन तन्निवोध धनञ्जय़ ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय २३
सूत उवाच
तत्ते वनं समासाद्य विजह्रुः पन्नगा मुदा |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
तत्ते वर्षं प्रवक्ष्यामि यथाश्रुतमरिन्दम |
९ क
वन पर्व
अध्याय २९४
कर्ण उवाच
तत्ते विप्र प्रदास्यामि न तु वर्म न कुण्डले ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
तत्ते विलपितं सर्वं मय़ा राजन्निशामितम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
तत्ते वुद्धिव्यभीचारमुपलप्स्यन्ति पाण्डवाः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
तत्ते वृकोदरमय़ं भय़ं व्येतु महाहवे |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ९२
स्त्र्यु उवाच
तत्ते शापाद्विनिर्मुक्ता आपवस्य महात्मनः |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
तत्ते श्रमो राजपुत्राभविष्य; न्न सङ्ग्रामादपय़ातुं दुरात्मन् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि कीर्त्यमानं निवोध मे ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि निखिलेन युधिष्ठिर ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ||
३९ ग
आदि पर्व
अध्याय २२०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्ते सर्वं यथावृत्तं कथय़िष्यामि भारत ||
४ ख