उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
त्यक्त्वानित्यं प्रतितिष्ठस्व नित्ये; सन्तुष्य त्वं तोषपरो हि लाभः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वानुविन्दोऽथ रथं विन्दस्य रथमास्थितः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
त्यक्ष्यते समरे प्राणान्मागधः परवीरहा ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
त्यक्ष्यन्ति तुमुले प्राणान्रक्षन्तः पार्थिवं यशः ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
१३८
लोमश उवाच
त्यक्ष्यामि त्वामृते पुत्र प्राणानिष्टतमान्भुवि ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
त्यज तद्राजशार्दूल मैवं शोके मनः कृथाः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
त्यज ताञ्ज्ञानमाश्रित्य धार्मिकानुपसेव्य च ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
त्यज धर्ममधर्मं च उभे सत्यानृते त्यज |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
त्यज धर्ममधर्मं च उभे सत्यानृते त्यज |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
त्यज धर्ममसङ्कल्पादधर्मं चाप्यहिंसय़ा |
४१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
त्यज शोकं महाराज भवितव्यं हि तत्तथा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
त्यजतां जीवितं प्राय़ो विवृते पुण्यपातके ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
त्यजति व्राह्मणः शिष्यान्देवय़ान्या प्रचोदितः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
त्यजत्यकारणे यश्च पितरं मातरं तथा |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
त्यजन्तं तुमुले प्राणान्के शूराः पर्यवारय़न् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
त्यजन्तं तुमुले प्राणान्संनद्धं चित्रय़ोधिनम् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
धृतराष्ट्र उवाच
त्यजन्तमाहवे प्राणान्संनद्धं चित्रय़ोधिनम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरय़गामिनः ||
७९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
त्यजन्ति दारान्प्राणांश्च मनुष्याः प्रतिपूजिताः |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
त्यजन्ति मित्रेषु धनानि काले; न संवासाज्जीर्यति मैत्रमेषाम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
त्यजन्ति ह्येनमुचितावरुद्धाः; स्निग्धा ह्यमात्याः परिहीनभोगाः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
त्यजन्तु मां प्रतिष्ठन्तं सत्त्वस्थो ह्यस्मि साम्प्रतम् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
त्यजामि काम त्वां चैव यच्च किञ्चित्प्रिय़ं तव |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
त्यजामि दारान्मम ये पुरातना; भवन्तु दास्यस्तव चारुहासिनि |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
त्यजेच्च पृथिवी गन्धमापश्च रसमात्मनः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
त्यजेच्छव्दं तथाकाशः सोमः शीतांशुतां त्यजेत् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
त्यजेत सञ्चय़ांस्तस्मात्तज्जं क्लेशं सहेत कः |
४६ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
त्यजेत सर्वां पृथिवीं समृद्धां; युधिष्ठिरः सत्यमथो न जह्यात् |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय
५५
विदुर उवाच
त्यजेत्कुलार्थे पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
त्यजेत्कुलार्थे पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
त्यजेत्कुलार्थे पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
त्यजेत्तद्राष्ट्रमासन्नमुपसृष्टमिवामिषम् ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
त्यजेत्प्राणान्प्रविशेद्धव्यवाहं; न त्वेवैष व्याहरेद्धर्मवाह्यम् |
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
त्यजेत्सर्वं मम प्रेम्णा जानात्येतद्धि मे गुरुः ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
त्यजेस्त्वमिति मे वुद्धिर्न तु धर्मं परित्यजेः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
त्यजेय़ं न पुनः सत्यं तेन सत्येन खं व्रज ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
त्यजेय़ं शाश्वतं धर्ममिति मे निश्चिता मतिः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
त्यजेय़मप्रिय़े हि त्वां कृते वासं च ते गृहे |
८ क
वन पर्व
अध्याय
५८
नल उवाच
त्यजेय़महमात्मानं न त्वेव त्वामनिन्दिते ||
२९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
गान्धार्यु उवाच
त्यजेय़ुराहवे शूराः प्राणहेतोः कथञ्चन ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
त्यजैनं कलुषं भावं व्राह्मणेभ्यो नमस्कुरु |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
त्यज्यतां काष्ठभूतोऽय़ं मृष्यतां जाम्वुकं वचः ||
९७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
त्यज्यतां दुष्टभावोऽय़ं भीष्मः किल्विषकृत्तव ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
त्यज्यतामेष निस्तेजाः शून्यः काष्ठत्वमागतः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
त्यज्यतामय़माकाशे ततः शीघ्रं निवर्तत ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
त्याग एव हि सर्वेषामुक्तानामपि कर्मणाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
त्यागं श्रेष्ठं मुनय़ो वै वदन्ति; सर्वश्रेष्ठो यः शरीरं त्यजेत |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
त्यागः कामवतीनां हि स्त्रीणां सद्भिर्विगर्हितः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
त्यागः स्नेहस्य यस्त्यागो विषय़ाणां तथैव च |
१७ क