chevron_left  त्रिगर्तराजंarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तराजं च रणे सह सर्वैर्महारथैः |
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तराजं समरे सपुत्रं विव्यधे शरैः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तराजं सहितं भ्रातृभिः पश्य केशव ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
त्रिगर्तराजः कमलाय़ताक्षि; क्षेमङ्करो नाम स एष वीरः ||
६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तराजः समरे भ्रातृभिः परिवारितः |
४ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगर्तराजः सुरथस्तस्याथ रथधूर्गतः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगर्तराजमादत्त सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तराजश्च वली मागधश्च सुदुर्जय़ः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तराजस्य सुतो व्यथय़ंस्तव वाहिनीम् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तराजो निहतान्समीक्ष्य; महारथांस्तानथ वन्धुवर्गान् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तराडपि क्रुद्धो भृशमाय़म्य कार्मुकम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तसेनापतिना स्वरथेनापवाहितः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
त्रिगर्ता भ्रातरः पञ्च रथोदारा मता मम |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तांश्चोदय़ामास युय़ुधानरथं प्रति ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्ताः संन्यवर्तन्त सन्तप्ताः स्वजनं प्रति ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्ताधिपतेरर्थे जीवितस्य विशां पते ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्ताधिपतेश्चापि भ्रातरं षड्भिराय़सैः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगर्तानस्पृशन्मत्स्याः सूर्ये परिणते सति ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तानां च द्वौ मुख्यौ यौ तौ संशप्तकाविति ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तानां च ये शूरा हतशिष्टा महारथाः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तानां त्रिसाहस्रा रथा युद्धविशारदाः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तानां महेष्वासाः सुवर्णविकृतध्वजाः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तानां रथोदाराः सुवर्णविकृतध्वजाः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तानां रथोदारैः समसज्जत पाण्डवः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तानां वलं पूर्णं जगाम पितृनन्दनः ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगर्तानां वय़ं हेतोर्मत्स्यान्योद्धुमिहागताः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगर्तानां सुशर्माणमार्च्छद्रुक्मरथं रणे ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगर्तान्निर्जिताञ्श्रुत्वा न स्थास्यन्ति कदाचन ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
त्रिगर्तान्मालवांश्चैव दरदांश्च सुदुर्जय़ान् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगर्तान्मे पिता यातः शून्ये सम्प्रणिधाय़ माम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तैः सह योत्स्यामि भारद्वाजस्य पश्यतः ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगर्तैः सहितो राजा समग्रवलवाहनः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगर्तैरभवद्युद्धं कृतवैरैः किरीटिनः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तैर्मत्स्यकैकेय़ैर्वाटधानैश्च संय़ुतौ ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
त्रिगर्तैश्च महेष्वासैर्दाक्षिणात्यैश्च संवृतः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
त्रिगुणं गुणकर्तृत्वादविश्वो निष्कलस्तथा |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
त्रिगुणं ज्योतिरित्याहुरापश्चापि चतुर्गुणाः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
त्रिगुणव्यतिरिक्तोऽसौ पुरुषश्चेति कल्पितः |
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगुणातिगश्चतुष्पञ्चधरः; पूर्तेष्टय़ोश्च फलभागहरः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिचक्षुः शम्भुरेकस्त्वं विभुर्दामोदरोऽपि च ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
त्रिजटश्चीरवासाश्च रुद्रः सेनापतिर्विभुः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रिजटां चार्थमानाभ्यां योजय़ामास राक्षसीम् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडङ्गवित् |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रित आत्मानमालक्ष्य कूपे वीरुत्तृणावृते |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रितः स श्रेष्ठतां प्राप यथैवास्य पिता तथा ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रितश्चाप्यगमत्प्रीतः स्वमेव निलय़ं तदा ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रितस्ततो महाभागः कूपस्थो मुनिसत्तमः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रितस्तेषां महाराज पुरस्ताद्याति हृष्टवत् |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रितस्य च महाराज जगामाथ हलाय़ुधः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रितस्य वर्तते यज्ञस्तत्र गच्छामहे सुराः |
३८ क