शल्य पर्व
अध्याय
६०
वासुदेव उवाच
त्वद्दोषैर्निहतः पाप तस्मादसि हतो रणे ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
त्वद्धितार्थं तु शक्रेण माय़या हृतकुण्डलः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
त्वद्धितार्थं तु स मय़ा हतः सङ्ग्राममूर्धनि |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
त्वद्धितार्थं सुरेन्द्रेण भिक्षितो वर्मकुण्डले ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
त्वद्धितार्थं हि नैषादिरङ्गुष्ठेन विय़ोजितः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वद्धेतोर्यजनपराय़णा द्विजेन्द्रा; वेदाङ्गान्यभिगमय़न्ति सर्ववेदैः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
त्वद्भक्तिनिरता देव निय़मैस्त्वा समाहिताः |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
त्वद्भक्त्यैव भजिष्यामि प्रख्यातं भारतं कुलम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
स्थाणुरु उवाच
त्वद्भवं हि जगन्नाथ जगत्स्थावरजङ्गमम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वद्भोज्यं भविता राज्यं सखे सत्येन ते शपे |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
सञ्जय़ उवाच
त्वद्युक्तोऽय़मनुप्रश्नो महाराज यथार्हसि |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
त्वद्युक्तोऽय़मनुप्रश्नो महाराज यथार्हसि |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वद्युक्तोऽय़मनुप्रश्नो यथावद्वदतां वर |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वद्युक्तोऽय़मनुप्रश्नो यन्मां पृच्छसि पार्थिव |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
त्वद्युक्तोऽय़मनुप्रश्नो युधिष्ठिर गुणोदय़ः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
त्वद्वले पाण्डवानां च सहस्राणि शतानि च ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
त्वद्वशाहं भविष्यामि रंस्यसे च मय़ा सह |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
त्वद्वाहुवलमाश्रित्य जीवितं परिमार्गति ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वद्वाहुवलमाश्रित्य राज्ञा धर्मसुतेन ह ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वद्वाहुवलवेगेन त्रासिताः सर्वराक्षसाः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वद्विधस्य महावुद्धे नैतदद्योपपद्यते |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वद्विधा हि महात्मानो न शोचन्ति परन्तप ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
त्वद्विधेभ्यो मय़ा ह्यात्मा रक्ष्यो मार्जार सर्वदा |
१८९ क
वन पर्व
अध्याय
२९१
कुन्त्यु उवाच
त्वद्वीर्यरूपसत्त्वौजा धर्मय़ुक्तो भवेत्स च ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
त्वद्वीर्यान्निहते वृत्रे वासवो व्रह्महत्यया |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
त्वद्वीर्येण विमुक्तोऽहं मद्वीर्येण तथा भवान् |
१५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
त्वद्वुद्धिप्लवमासाद्य दुःखशोकार्णवाद्वय़म् |
११६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
राजो उवाच
त्वन्निदेशे स्थितः शश्वत्पुजय़िष्याम्यहं द्विजान् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वन्निमित्तं विशेषेण नेह युक्तमसाम्प्रतम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
त्वन्निमित्तमतो नेमौ किञ्चिज्जिह्मं वदिष्यतः |
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५५
विदुर उवाच
त्वन्निय़ुक्तः सव्यसाची निगृह्णातु सुय़ोधनम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वन्निय़ोगेन चैवेय़ं रूपं मम समीक्ष्य च |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वन्नेत्राः सन्तु ते पुत्रा मा त्वां दीर्णाः प्रहासिषुः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
त्वन्मन्त्रवलय़ुक्तो हि विन्देत जय़मेव ह ||
१२७ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
त्वन्मुखं च जगत्कृत्स्नं भविष्यति न संशय़ः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वन्मुखानकरोद्राजन्न च त्वामत्यवर्तत ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
त्वन्मुखाश्चैव दैतेय़ा व्यतिष्ठंस्तव शासने |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं; त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२२३
स्तम्वमित्र उवाच
त्वमग्निर्हव्यवाहस्त्वं त्वमेव परमं हविः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वमग्ने प्रथमः सृष्टो व्रह्मणा तिमिरापहः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
त्वमग्ने सर्वदेवानां मुखं त्वमसि हव्यवाट् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
त्वमग्ने सर्वदेवानां मुखं त्वमसि हव्यवाट् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
त्वमग्ने सर्वभूतानामन्तश्चरसि नित्यदा |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
त्वमजः शाश्वतो धाता मतोऽमृतमनुत्तमम् |
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
गौतम उवाच
त्वमत्र हेतुं जानीषे तस्मात्सत्यं निरुच्यताम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वमद्य निशितैर्वाणैर्हत्वा शत्रून्ससैनिकान् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
त्वमनासाद्य तान्वाणान्फल्गुनस्य विगर्जसि |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि पावक ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि साक्षिवत् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२३
स्तम्वमित्र उवाच
त्वमन्नं प्राणिनां भुक्तमन्तर्भूतो जगत्पते |
१५ क