आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
त्रिपुरघ्नं त्रिनय़नं त्रिलोकेशं महौजसम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
त्रिपुरघ्नरथो यद्वद्गोवृषेण विराजते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
त्रिभागं व्रह्महत्याय़ाः कन्या प्राप्नोति दुष्यती |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
त्रिभागमात्रशेषाय़ां रात्र्यां युद्धमवर्तत |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिभागशेषः पक्षोऽय़ं शुक्लो भवितुमर्हति ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिः शरैरदीनात्मा स्मरन्क्लेशं पुरातनम् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिः शरैरसम्भ्रान्तो ललाटे वै समर्पय़त् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिः शरैर्महाराज वासुदेवं च पञ्चभिः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिः शरैर्वासुदेवं सहस्रेण च पाण्डवम् ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिः शारद्वतं वाणैर्जत्रुदेशे समर्पय़त् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिः शारद्वतं विद्ध्वा रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रिभिरंशैरधर्मस्तु लोकानाक्रम्य तिष्ठति |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिरन्यैः सुनिशितैर्विशोकं प्रत्यविध्यत ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिरश्वसहस्रैश्च पदातीनां शतैः शतैः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिराशीविषाकारैर्ललाटे समविध्यत ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
त्रिभिरासादितोऽस्माभिर्विजने स नराधिपः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिरेव महावेगैः शरैः संनतपर्वभिः ||
२२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिरेव युधामन्युं चतुर्भिश्चोत्तमौजसम् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
त्रिभिर्गुणमय़ैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
मैत्रेय़ उवाच
त्रिभिर्गुणैः समुदितस्ततो भवति वै द्विजः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिर्द्रोणोऽहरत्प्राणांस्ते हता न्यपतन्भुवि ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
त्रिभिर्द्वाभ्यामेकतो वा विशिष्टो; नास्य स्वमस्तीति स वेदितव्यः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
त्रिभिर्नेत्रैः कृतोद्द्योतं त्रिभिः सूर्यैरिवोदितैः ||
११९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिभिर्नेत्रैः कृतोद्द्योतस्त्रिभिः सूर्यैरिवोदितैः ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिभिर्भवद्भिर्हि विना नाहं जीवितुमुत्सहे |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिर्युधामन्युमविध्यदाशुगै; स्त्रिभिस्त्रिभिः सोमकपार्षतात्मजौ ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
त्रिभिर्वर्णैर्नरश्रेष्ठ तं भागं रक्षसां विदुः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
त्रिभिर्वर्णैस्तथा जातः शूद्रो देय़धनो भवेत् ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिभिर्वर्षैः सदोत्थाय़ी कृष्णद्वैपाय़नो मुनिः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
त्रिभिर्विक्रमणैः कृष्ण क्रान्तवानसि तेजसा ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रिभिर्विक्रमणैर्देव त्रय़ो लोकास्त्वय़ाहृताः |
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिर्विव्याध नाराचैर्ललाटे विस्मय़न्निव ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिश्च तस्य चिच्छेद ज्वलन्तं ध्वजमुत्तमम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिश्च दक्षिणे वाहौ सव्ये च निशितैस्त्रिभिः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिश्च निशितैर्वाणैर्हत्वा त्रीन्वै महारथान् ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिश्च भीमं नकुलं च सप्तभि; र्जनार्दनं द्वादशभिश्च साय़कैः ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिश्चान्यैः शरैस्तीक्ष्णैः सुपुङ्खै रुक्ममालिनम् |
१२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिश्चान्यैः शरैस्तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिश्चिच्छेद सहसा तं च विव्याध सप्तभिः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिस्तीक्ष्णैर्महावेगैरुदगृह्णाच्छिरः शरैः ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिस्तु विद्ध्वा गाण्डीवं नाराचैः षड्भिरर्जुनम् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिस्त्रिभिः शरैर्घोरैर्भीष्ममानर्छुरञ्जसा ||
९९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिस्त्रिभिरकुण्ठाग्रैर्भृशं मर्मस्वताडय़न् ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकैः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिस्त्रिभिर्द्रौपदेय़ा धृष्टकेतुश्च विव्यधुः ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिस्त्रिभिर्भीमवलो निहत्य; ननाद घोरं महता स्वरेण ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिस्त्रिभिर्महेष्वासो यतमानान्महारथान् |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिभिस्त्रिवेणुं समरे द्वाभ्यामक्षौ महावलः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
त्रिभिस्त्रीनवधीद्भीमः पुनरेव सुतांस्तव ||
९६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
त्रिभुवनसृजमीश्वरेश्वरं; क इह पुमान्भवमाह्वय़ेद्युधि |
६४ क