chevron_left  रहिताarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ७२
वृहदश्व उवाच
रहिता भर्तृभिश्चैव न क्रुध्यन्ति कदाचन |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
रहितान्भीमसेनेन कदाचित्तान्यदृच्छय़ा |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
रहिते सञ्जय़ं राजा परिप्रष्टुं प्रचक्रमे ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
रहो द्रोणं समागम्य प्रणय़ादिदमव्रवीत् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ७१
दमय़न्त्यु उवाच
रहोऽनीचानुवर्ती च क्लीववन्मम नैषधः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
राका च धिषणा चैव पत्न्यश्चान्या दिवौकसाम् ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
राकाय़ां मिथुनं जज्ञे खरः शूर्पणखा तथा ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
राक्षसं क्रूरकर्माणं क्रूरकर्मा घटोत्कचः |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
राक्षसं क्रूरकर्माणं भैमसेनिं महावलम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
राक्षसं क्रूरकर्माणं यथेन्द्रस्तारकं पुरा ||
१७ ग
आदि पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसं तमनादृत्य भुङ्क्त एव पराङ्मुखः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
राक्षसं दुद्रुवुः सर्वे ग्रहाः पञ्च यथा रविम् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसं भुङ्क्त एवान्नं पाण्डवः परवीरहा ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
राक्षसं भेषजं प्रोक्तं संसिद्धं वचनोत्तरम् ||
७२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
राक्षसं मन्यमानास्तं नय़नानि न्यमीलय़न् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसं मन्यमानोऽपि यो हन्यान्नरकं व्रजेत् ||
३३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
राक्षसं राक्षसः क्रुद्धः समाजघ्ने ह्यलम्वुसः ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसं शङ्कमानस्तु विकृष्य वलवद्धनुः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
राक्षसः किङ्करो नाम विवेश नृपतिं तदा ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
राक्षसश्च महामाय़ः स च राजातिकोपनः |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वासुदेव उवाच
राक्षसस्तापय़ामास तीव्रकर्मा महावलः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसस्तु वरं लव्ध्वा दशग्रीवो विशां पते |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
राक्षसस्य तु तं शव्दं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
राक्षसस्य महामाय़ां हत्वा राक्षसमार्दय़त् ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसस्य महाराज रामक्षिप्तस्य वै पुरा ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसा निहताः सर्वे तव देव पुरःसराः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसा भग्नसङ्कल्पा लङ्कामभ्यपतन्भय़ात् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसा विस्मिता राजन्सस्त्रीवृद्धाः समन्ततः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसाः पुरुषादाश्च पिशाचाश्च महावलाः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय २७४
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसाः प्रत्यदृश्यन्त शरशक्त्यृष्टिपाणय़ः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैश्रवण उवाच
राक्षसाधिपतिः श्रीमान्मणिमान्नाम मे सखा |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
राक्षसाधिपतिर्वीरो विरूपाक्ष इति श्रुतः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसाधिपतेः स्थानं ददर्श भरतर्षभः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
राक्षसानां च मुख्यस्य दुर्योधनवलस्य च ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
राक्षसानां च मुख्यस्य नराणामुत्तमस्य च ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
राक्षसानां च राजेन्द्र दुर्योधनवलस्य च ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसानां पिशाचानां केचिच्चाप्युत्तरान्कुरून् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
राक्षसानां विरूपाणां सहस्रैः परिवारितः |
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
राक्षसानां सुराणां च यक्षाणां च तथा प्रिय़ाः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
राक्षसानेव तान्विद्धि निर्वषट्कारमङ्गलान् ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसान्दानवान्नागाञ्जघ्ने चक्रेण तान्हरिः ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसान्नमसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते ह्यन्नमीदृशम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
राक्षसान्विषय़ाञ्ज्ञात्वा यक्षाणां विषय़ांस्तथा |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
राक्षसापसदं हन्तुं स्वय़मेव पितामह |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
राक्षसाश्च ददुस्तस्मै वराहमहिषावुभौ ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
राक्षसाश्च पिशाचाश्च तथान्ये पिशिताशनाः |
४४ क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
राक्षसाश्च पिशाचाश्च दानवा गुह्यकास्तथा |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
राक्षसाश्च पिशाचाश्च यातुधानाः शलावृकाः |
१०२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
राक्षसाश्च महारौद्राः पिशाचाश्च महावलाः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
राक्षसाश्चापि लोकेऽस्मिन्यदोत्पत्स्यन्ति दारुणाः ||
२७ ख