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उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत्पाणिपादं च चक्षुषा |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
धृत्वा धनञ्जय़वधे प्रतिज्ञां चापि चक्रिरे ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
धृष्टं शूरं प्रहर्तारमनृशंसं जितेन्द्रिय़म् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुं च शल्याय़ गौतमाय़ोत्तमौजसम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुं च समरे माद्रीपुत्रः परन्तपः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
धृष्टकेतुं तमाय़ान्तं द्रोणात्कः समवारय़त् ||
३९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
धृष्टकेतुं महेष्वासं चेदिपुङ्गवमङ्गनाः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुः कृपेनास्ताञ्छित्त्वा वहुविधाञ्शरान् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
धृष्टकेतुः स्वसारं च समादाय़ाथ चेदिराट् |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुमथाय़ान्तं द्रोणहेतोः पराक्रमी |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
धृष्टकेतुरिति ख्यातः स आसीन्मनुजेश्वरः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
धृष्टकेतुरुपागच्छत्पाण्डवानमितौजसः ||
७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
जनमेजय़ उवाच
धृष्टकेतुर्जय़त्सेनो राजा चैव स सत्यजित् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुर्नरव्याघ्रः करकर्षश्च वीर्यवान् |
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुर्महाराज चेदीनां प्रवरो रथः |
८० क
उद्योग पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
धृष्टकेतुर्महेष्वासः सम्वन्धी पाण्डवस्य ह ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
धृष्टकेतुर्वृहत्केतुर्दीप्तकेतुर्निरामय़ः ||
१७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुश्च चेदीनामृषभोऽतिवलोदितः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुश्च चेदीनामृषभोऽतिवलोदितः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुश्च चेदीनामृषभोऽतिवलोदितः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
धृष्टकेतुश्च वलवान्कुन्तिभोजश्च मारिष |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुश्च संरव्धो मत्स्याश्चान्वपतन्रणे ||
३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुश्च समरे राक्षसश्च घटोत्कचः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुस्ततो राजन्नभिमन्युश्च वीर्यवान् |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
धृष्टकेतोश्च भगिनी जरासन्धस्य चात्मजा |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
धृष्टत्वादतिधृष्णुत्वाद्धर्माद्द्युत्सम्भवादपि |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्न उवाचेदं मां वचो गतसाध्वसः ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्न निवोधेदं यत्त्वा वक्ष्यामि मारिष |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्न पलाय़स्व सह पाञ्चालसेनय़ा |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्न स्थिरो भूत्वा मुहूर्तं प्रतिपालय़ |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं कृपः क्रुद्धो वाणवर्षैरपीडय़त् |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं कृपो राजन्वारय़ामास संय़ुगे |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यं क्रूरैः सार्धं प्रभद्रकैः |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यं धृष्टकेतुं च पार्थिवम् |
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यमिदमाह जनाधिप |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च भीमं च विचरन्तौ महारणे ||
४८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च विंशत्या धर्मपुत्रं च सप्तभिः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च शैनेय़ं शिखण्डिनमथापि च |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
धृष्टद्युम्नं च सञ्चिन्त्य तथैव च शिखण्डिनम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च सप्तत्या धर्मपुत्रं च सप्तभिः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च समरे तूर्णं विव्याध साय़कैः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च समरे हन्ताहं पापकारिणम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च सम्प्रेक्ष्य रणे स विमनाभवत् ||
९३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च हत्वा स तांश्चैवास्य पदानुगान् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं चेदमाह भीमसेनो महावलः ||
४५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं जिघांसन्तः क्रुद्धाः पार्षतमभ्ययुः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं ततो द्रोणो विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं ततो यान्तं शारद्वतरथं प्रति |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं ततो विद्ध्वा विननाद महावलः ||
३ ख