उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
धर्मे नित्या पाण्डव ते विचेष्टा; लोके श्रुता दृश्यते चापि पार्थ |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
धर्मे प्रय़तमानस्य सत्यं च वदतः समम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
धर्मे फलं वेत्थ कृते महर्षे; तथेतरस्मिन्नरके पापलोके ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३२
शेष उवाच
धर्मे मे रमतां वुद्धिः शमे तपसि चेश्वर ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
धर्मे रतमना नित्यं नरो धर्मेण युज्यते ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मे रतिश्च सततं स्वर्गे वासस्तथाक्षय़ः ||
३१ ग
वन पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
धर्मे राजन्वर्तमानः स्वशक्त्या; पुत्रान्सर्वान्पाहि कुन्तीसुतांश्च ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
धर्मे वर्त्मनि संस्थाप्य प्रजा वर्तेत धर्मवित् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
धर्मे वर्धति वर्धन्ति सर्वभूतानि सर्वदा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
धर्मे व्यावर्तमाने तु लोको व्यावर्तते पुनः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
विष्णुरु उवाच
धर्मे सत्ये दमे चैव वुद्धिर्भवतु मे सदा |
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मे स्थितं सत्यधृतिं ज्येष्ठं ज्येष्ठापचाय़िनम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
धर्मे स्थितस्य हि यथा न कश्चिद्वृजिनं क्वचित् ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मे स्थिता महात्मानो निकृताः पाण्डुनन्दनाः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
धर्मे स्थिता हि राजानो जय़न्ति पृथिवीमिमाम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
धर्मे स्थितां स्थितो धर्मे सदा प्रिय़हिते रताम् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मे स्थिताः पाण्डवेय़ाः कस्तान्किं वक्तुमर्हति ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
धर्मे स्थितानां कौन्तेय़ सिद्धिर्भवति शाश्वती ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
धर्मे स्थितास्मि सततं कुलशीलसमन्विता |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मे स्थितो धर्मराजो महात्मा; स्वय़ं चेदं कथय़त्विन्द्रकल्पः |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
धर्मे स्थितो धर्मसुतश्च राजा; धर्मश्च सूक्ष्मो निपुणोपलभ्यः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
धर्मे स्थित्वा स तु वै भावितात्मा; परांश्च लोकानपरांश्च याति ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जय़न् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
युधिष्ठिर उवाच
धर्मेण च सुखानर्थाँल्लभेद्येन व्रवीहि तम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण जित्वा पृथिवीमखिलां धर्मविद्वशी |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
धर्मेण जय़मिच्छन्तो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
धर्मेण तु जय़ो युद्धे तत्परं साधु देवनम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण तेऽभ्यनुज्ञाताः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण देवा दिविगा धर्मे चार्थः समाहितः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
धर्मेण धर्मप्रवरः सुकुमारीमनिन्दिताम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
धर्मेण न समस्त्वं वै तुलाधारस्य जाजले ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
धर्मेण निधनं श्रेय़ो न जय़ः पापकर्मणा ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण निहतः सङ्ख्ये स च राजा सुय़ोधनः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
धर्मेण निहता युद्धे गताः स्वर्गं न संशय़ः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
धर्मेण पृथिवीं जित्वा यज्ञैरिष्ट्वाप्तदक्षिणैः |
१६५ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः ||
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण राजा धर्मज्ञः पातु सर्वां वसुन्धराम् |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण राज्ञा धर्मज्ञ प्राप्तं राज्यमकण्टकम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
धर्मेण राज्यं विन्देत धर्मेण परिपालय़ेत् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
धर्मेण लव्ध्वा तां भार्यामृचीको द्विजसत्तमः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण विजितां मन्ये मन्यन्ते द्रुपदात्मजाम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
धर्मेण वेदाध्ययनं वेदाङ्गानां तथैव च |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
धर्मेण व्यजय़ल्लोकांस्त्रीन्विष्णुरिव विक्रमैः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
धर्मेण व्यवहारेण प्रजाः पालय़ पाण्डव |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
धर्मेण सर्वकार्याणि कीर्तितानीति भारत |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
धर्मेण सर्वकृत्यानि समनिष्ठानि कारय़ेत् ||
१९ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण सहितो धीमान्स्तूय़मानो महर्षिभिः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
धर्मेण हि महीपालश्चिरं पालय़ते महीम् ||
६८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
धर्मेणाधर्मं प्रणुदतीह विद्वा; न्धर्मो वलीय़ानिति तस्य विद्धि ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
धर्मेणापिहितं पापं धर्ममेवाभिवर्धय़ेत् ||
३० ख