वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
न दूरमेतन्मम भर्तृसंनिधौ; मनो हि मे दूरतरं प्रधावति |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
न दूरे ते गताः क्षुद्रास्तावद्गच्छामहे सह |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
न दूषय़ामि ते राजन्यच्च हन्याददूषकम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
न दृश्यते रविस्तात न दिशो न च खं खग ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
राजो उवाच
न दृश्यते वने चास्मिंस्तमन्वेष्टुं चराम्यहम् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
न दृश्यते सरिच्छ्रेष्ठा यस्मादिह सरस्वती ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
न दृश्यश्चक्षुषा योऽसौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
न दृष्टं न श्रुतं चापि युद्धमेतादृशं नृप |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
न दृष्टपूर्वं प्रत्यक्षं परलोकं विदुर्वुधाः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
न दृष्टपूर्वं मनुजैर्न च तन्नास्ति तावता ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
न दृष्टपूर्वा चान्यत्र साहमद्य सभां गता ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
न दृष्टपूर्वा ये तेन नगरे नागसाह्वय़े ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
धृतराष्ट्र उवाच
न देवकीसुते मुक्ता फल्गुने वापि सञ्जय़ ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
न देवतानां काचिद्धि समर्था जातवेदसः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
न देवल गतिस्तत्र तव गन्तुं तपोधन |
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
न देवा न च गन्धर्वा नासुरोरगराक्षसाः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
न देवा यष्टिमादाय़ रक्षन्ति पशुपालवत् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
न देवाः प्रतिगृह्णन्ति पितरो व्राह्मणास्तथा |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
न देवानां नापि च मानुषाणां; भविष्यसि त्वं तर्कणीय़ो नरेन्द्र ||
१०४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
न देवान्नैव दितिजान्न गन्धर्वान्न मानुषान् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः |
२३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
न देवासुरगन्धर्वैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः |
११७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
न देवि तिष्ठामि तथाविधेषु; नरेषु संसुप्तमनोरथेषु ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
न देवितव्यं हृष्टेन कितवेनेति नः श्रुतम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
न देवी नासुरी चैव न यक्षी न च राक्षसी |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
न देवीं नासुरीं चैव न यक्षीं न च राक्षसीम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
न देवेषु न यक्षेषु तादृग्रूपवती क्वचित् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
न देवेष्वपि तुल्यां हि त्वय़ा पश्याव भामिनि ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
कुण्डधार उवाच
न देवैरननुज्ञातः कश्चिद्भवति धार्मिकः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
न देशं न दिशं काञ्चिद्गन्तुमिच्छन्विशेषतः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
न देहभेदे मरणं विजानतां; न च प्रणाशः स्वनुपालिते पथि |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
न देय़मेतच्च तथानृतात्मने; शठाय़ क्लीवाय़ न जिह्मवुद्धय़े |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
व्रह्मो उवाच
न दैन्यं नाशुभं किञ्चिद्विद्यते तत्र वासव ||
३८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
न दैवं न च गान्धर्वं व्राह्मं ध्रुवमिदं परम् |
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
न दैवतानि लोकेऽस्मिन्व्यापारं यान्ति कस्यचित् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
न दैवमकृते किञ्चित्कस्यचिद्दातुमर्हति ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
न दैवस्यातिभारोऽस्ति न दैवस्यातिवर्तनम् |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
कृप उवाच
न दैवस्यातिभारोऽस्ति यदय़ं रुधिरोक्षितः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
न दोषेण कुरुश्रेष्ठ कौरवान्गन्तुमर्हसि ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
स्त्र्यु उवाच
न दोषो भविता चैव सत्येनैतद्व्रवीम्यहम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
न द्यौर्न भूमिर्न दिशः प्राज्ञाय़न्त तथा गते |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
न द्रुह्येच्चैव दद्याच्च सत्यं चैव परं वदेत् |
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
न द्रुह्येच्चैव दद्याच्च सत्यं चैव सदा वदेत् ||
८९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
न द्रुह्येन्मनसा चापि गोषु ता हि सुखप्रदाः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
न द्रोणः समरे पार्थं जानीते प्रिय़मात्मनः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
न द्रोणः सह सैन्येन कृतवर्मा च संय़ुगे |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
न द्रोणव्यसनं कश्चिज्जानीते भरतर्षभ |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
न द्रोणसैन्यं वलवत्क्रामेत्तत्र कथञ्चन ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
न द्रोणो न च राधेय़ो नाश्वत्थामा कृपो न च |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
न द्वितीय़ां प्रतिज्ञां हि प्रतिज्ञास्यति केशवः |
२३ क