आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
न चैतन्नः प्रिय़ं तात यदिदं कर्तुमिच्छसि |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
न चैतन्नैष्ठिकं कर्म त्रय़ाणां भरतर्षभ |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
न चैतां प्राज्ञतां तात यय़ा चरसि मेधय़ा ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
न चैतानधिजग्मुस्ते समुद्रं समुपाश्रितान् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
न चैतानृत्विजो लुव्धा याजय़न्ति धनार्थिनः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
न चैतान्हर्षसम्पूणानिय़ं सेहे वसुन्धरा ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
न चैते तव पर्याप्ता ज्ञाने धर्मार्थय़ोस्तथा |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
न चैते दोषाः स्वर्गे प्रादुर्भवन्ति तत्र भवति खलु ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
न चैते स्वर्गकामस्य रोचन्ते सुखमेधसः ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
न चैतेभ्यः प्रदातव्या न वोढव्या तथाविधा |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
न चैतय़ोर्विकारं वै ददर्श भृगुनन्दनः ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
न चैनं कम्पय़ामास मातरिश्वेव पर्वतम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
न चैनं क्लेदय़न्त्यापो न शोषय़ति मारुतः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनं चालय़ामास धैर्यात्सुदृढनिश्चय़म् ||
३५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
न चैनं तावकाः सर्वे विषेहुररिघातिनम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
न चैनं ददृशुश्छन्ना रजसामृतरक्षिणः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
न चैनं परिहर्तुं तेऽशक्नुवन्परिसङ्क्षय़े |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
न चैनं पाण्डवा युद्धे जेतुमुत्सहिरे प्रभो ||
५८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
न चैनं पाण्डवा युद्धे वाय़रामासुरुल्वणम् ||
९१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
न चैनं पाण्डवेय़ानां कश्चिच्छक्नोति मारिष |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
न चैनं पाण्डवेय़ानां कश्चिच्छक्नोति वीक्षितुम् |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
न चैनं पाण्डवेय़ानां केचिच्छेकुर्निरीक्षितुम् |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
न चैनं पार्थिवा राजञ्शेकुः केचिन्निरीक्षितुम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
न चैनं भर्तृपूजाभिः पूजय़न्ति कदाचन |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
न चैनं वारय़ामासुर्व्यात्ताननमिवान्तकम् ||
३७ ग
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
न चैनं विक्रिय़ां नेतुमशकन्मुद्गलं क्षुधा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
न चैनं संय़ुगे कश्चित्समर्थः प्रतिवीक्षितुम् |
६५ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनमत्यगाद्वह्निर्वेलामिव महोदधिः ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१४
कृष्ण उवाच
न चैनमनुरुध्यन्ते कुलान्येकशतं नृपाः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनमन्येऽपि विदुः कथञ्चन; प्रादाच्च तस्मै भरणं यथेप्सितम् ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनमन्येऽपि विदुः कथञ्चन; प्रिय़ाभिरामं विचरन्तमन्तरा ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनमभ्यजानंस्ते तदा विकृतदर्शनम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
न चैनमभ्यनन्दंस्ते राजानो व्राह्मणैः सह |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
न चैनमभ्यभाषन्त मनोभिस्त्वभ्यचिन्तय़न् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
न चैनमर्जुनो जातु प्रतिय़ुध्येत धर्मवित् ||
६५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
न चैनमव्रवीत्किञ्चिच्छुभं वा यदि वाशुभम् ||
४८ ग
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
न चैनमशकं हन्तुं तदद्भुतमिवाभवत् |
३० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनमशकत्कश्चिन्निवर्तस्वेति भाषितुम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
न चैनमशकत्क्षेप्तुं हन्तुं वापि गुरोर्भय़ात् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनमशकद्भानुरहं वा स्नेहकारणैः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनमशकद्वीरः कथञ्चित्प्रतिवाधितुम् ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनमूचुर्विदितं तदा नराः; सविस्मितं वाक्यमिदं नृपोऽव्रवीत् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनमेवं जानन्ति तमोभूता विशां पते ||
६४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
न चैनां मोक्षय़ामास वीरो माद्रवतीसुतः ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनां वेद तत्रान्यस्तत्त्वेन जनमेजय़ ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
न चैनानन्ववुध्यन्त नरा नगरवासिनः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
न चैनानन्ववुध्यन्त मनुजा मनुजोत्तम |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
न चैनान्वहु मन्यन्ते पुत्रास्तव विशां पते ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
न चैभिः पुण्यकर्माणो युज्यन्ते नाभिसन्धिजैः |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
न चैव जीविताशाय़ां निर्वेदमुपगच्छति ||
२२ ख