वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते ||
१७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानां तदद्भुतमिवाभवत् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
दुर्योधन उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानां भगवान्प्रपितामहः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
विष्णुरु उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानां महत्कार्यं करिष्यसि ||
२५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
दुर्योधन उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानां विदितं मम सर्वथा ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानां समर्थ इति मे मतिः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानामर्चनीय़ो जनार्दनः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानामहमिन्द्रः शुचिस्मिते |
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानामालोककरणो भवेत् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
व्रह्मो उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानामुपरिष्टान्निवत्स्यसि |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
त्रय़ाणामपि लोकानामैश्वर्यार्थे कथञ्चन ||
९५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ाणामेव च मतं तत्त्वमेकोऽनुमन्यसे |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
त्रय़ी चान्वीक्षिकी चैव वार्ता च भरतर्षभ |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ी वार्ता दण्डनीतिस्तिस्रो विद्या विजानताम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ीं च नाम वार्तां च त्यक्त्वा पुत्रांस्त्यजन्ति ये |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
त्रय़ीं विद्यां निषेवेत तथोपासीत स द्विजान् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
त्रय़ीविद्यामवेक्षेत वेदेषूक्तामथाङ्गतः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
त्रय़ो गुणाः प्रवर्तन्ते अव्यक्ता नित्यमेव तु |
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
त्रय़ो गुल्मा गणो नाम वाहिनी तु गणास्त्रय़ः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
त्रय़ो न्याय़ा मनुष्याणां श्रूय़न्ते भरतर्षभ |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
त्रय़ो भागा ह्यधर्मस्य तस्मिन्काले भवन्त्युत |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
त्रय़ो मूर्तिविहीना वै पिण्डमूर्तिधरास्त्विमे |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
उमो उवाच
त्रय़ो वर्णाः प्रकृत्येह कथं व्राह्मण्यमाप्नुय़ुः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
त्रय़ो वै रिपवो लोके नव वै गुणतः स्मृताः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
त्रय़ो वय़ं गमिष्यामो लघ्वाहारा यतव्रताः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
त्रय़ो हि धातवः ख्याताः कर्मजा इति च स्मृताः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
त्रय़ो हि समतिक्रान्ताः पाण्डवानां महारथाः |
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२१
गान्धार्यु उवाच
त्रय़ोदश समा निद्रां चिन्तय़न्न्नाध्यगच्छत ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
त्रय़ोदश समा निद्रां न लेभे पुरुषर्षभः ||
७७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
त्रय़ोदश समा भुक्तं राज्यं विलपतस्तव |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोदश समाः कालो ज्ञाय़तां परिनिष्ठितः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोदश समुद्रस्य द्वीपानश्नन्पुरूरवाः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
त्रय़ोदश सहस्राणि वर्षाणां ते जनाधिप |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोदश हि वर्षाणि प्रतीक्षन्त्या गतानि मे |
४० क
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
त्रय़ोदशं च सजने अज्ञाताः परिवत्सरम् |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
६७
शकुनिरु उवाच
त्रय़ोदशं च सजने अज्ञाताः परिवत्सरम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोदशं तथाज्ञातैः सजने परिवत्सरम् ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोदशः शालिशिराः पर्जन्यश्च चतुर्दशः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
त्रय़ोदशद्वादशाहांश्च देव; सपौण्डरीकान्न च तेषां फलेन ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
त्रय़ोदशश्चैव सुदुस्तरोऽय़; मज्ञाय़मानैर्भवतां समीपे |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोदशसमा भुक्तं दत्तं च विविधं वसु ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षाय़णी वरा |
९ क
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
त्रय़ोदशानां वर्षाणामन्ते दुर्द्यूतदेविनः ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
त्रय़ोदशानां वर्षाणामिति मे वर्तते मतिः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
त्रय़ोदशाहं वर्षाणि यस्माद्भीतो धनञ्जय़ |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
सैरन्ध्र्यु उवाच
त्रय़ोदशाहमात्रं मे राजा क्षमतु भामिनि |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
लोमश उवाच
त्रय़ोदशाहानि ससार केशी; त्रय़ोदशादीन्यतिच्छन्दांसि चाहुः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
वन्द्यु उवाच
त्रय़ोदशी तिथिरुक्ता महोग्रा; त्रय़ोदशद्वीपवती मही च |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
६७
शकुनिरु उवाच
त्रय़ोदशे च निर्वृत्ते पुनरेव यथोचितम् |
१२ क