अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
त्रय़ोदशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राशते हविः |
५५ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोदशेनेन्द्रसमः कृपं वक्षस्यताडय़त् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
त्रय़ोदशैतेऽतिवलाः शत्रवः प्राणिनां स्मृताः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोदशोऽय़ं सम्प्राप्तः कृच्छ्रः परमदुर्वसः ||
५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोदश्याममावास्यां तां दृष्ट्वा प्राव्रवीदिदम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोविंशतिरात्रं यो योधय़ामास भार्गवम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
त्रय़ोविंशे तु दिवसे प्राशेद्यस्त्वेकभोजनम् |
९३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
त्रय़ोऽग्नय़ो व्याहृतय़श्च तिस्रः; सर्वे देवा देवकीपुत्र एव ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
देवय़ान्यु उवाच
त्रय़ोऽस्यां जनिताः पुत्रा राज्ञानेन यय़ातिना |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
त्रय़्या संवृतरन्ध्रश्च राजा भवितुमर्हति |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
त्व हि नित्यं नरव्याघ्र स्पर्धसे सव्यसाचिना |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
त्वं कर्ण प्रतिय़ाह्येनं नास्त्यन्यो हि धनुर्धरः ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
त्वं कर्मस्वनुरूपेषु निय़ोजय़सि भारत ||
६४ ख
विराट पर्व
अध्याय
१३
द्रौपद्यु उवाच
त्वं कालरात्रीमिव कश्चिदातुरः; किं मां दृढं प्रार्थय़सेऽद्य कीचक |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
त्वं कृतो ह्येव भीष्मेण द्रोणद्रौणिकृपैरपि |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
त्वं गतिः सर्वभूतानां त्वं नेता त्वं जगन्मुखम् |
६१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वासुदेव उवाच
त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं गतिः सह तैर्वीरैः पाण्डवैर्द्विपदां वर ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं गतिस्त्वं च मे नाथः प्रसादं कर्तुमर्हसि ||
२१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
त्वं गुरुः सर्वभूतानां जानीषे त्वं गतागतम् |
३० ख
वन पर्व
अध्याय
७२
केशिन्यु उवाच
त्वं च कस्य कथं चेदं त्वय़ि कर्म समाहितम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
त्वं च कामगमस्तात माय़ास्त्रे च विशारदः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं च कामगमस्तात वलवान्वह तां खग ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
द्रुपद उवाच
त्वं च कुन्ती च कौन्तेय़ धृष्टद्युम्नश्च मे सुतः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
त्वं च गाण्डीवधन्वा च विजय़ी यदुनन्दन |
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
त्वं च दुर्योधन वलं यदि शक्नोषि धारय़ |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
दुर्योधन उवाच
त्वं च द्रोणश्च शल्यश्च कृपो द्रौणिस्तथैव च |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं च मातर्यथा सत्यं व्रवीमि भुजगोत्तमे ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
त्वं च यन्ता हृषीकेश किं नु स्यादजितं मय़ा ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
७७
यय़ातिरु उवाच
त्वं च याचसि मां कामं व्रूहि किं करवाणि ते ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं च यादवशार्दूल सभाय़ां वै समेष्यथ ||
७० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
त्वं च राज्ञि महत्कृच्छ्रं सम्प्राप्ता वरवर्णिनि ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
त्वं च वालिशय़ा वुद्ध्या सदैवास्मान्प्रवाधसे ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
ऋषय़ ऊचुः
त्वं च वीर वलश्रेष्ठस्तस्मादिन्द्रो भवस्व नः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं च शूरः सदामर्षी शस्त्रनित्यश्च भारत |
६२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
त्वं च शूरोऽसि कौन्तेय़ तस्मात्क्षम मुहूर्तकम् ||
६३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं च श्रेष्ठतमो लोके सतामद्य जनार्दन |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
त्वं च सा चोपय़ुञ्जीथां ततः पुत्राववाप्स्यथः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
त्वं च सूतकुले जातो विनीतः सूतकर्मणि |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
त्वं च सोमं भय़ाद्यस्य गतः पातुं शुरेश्वर ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
त्वं चाथ गुरुरप्येषामेवमन्योन्यगौरवम् ||
१७१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वासुदेव उवाच
त्वं चाद्य कुरुवीराणां धर्मेणाभिविराजसे |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
त्वं चापगेय़ नामानि निशामय़ जगत्पतेः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं चापि कुशली राजन्माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
त्वं चापि कुशली राजन्माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
त्वं चापि कुशली राजन्माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
त्वं चापि तत्तथा कृष्ण सर्वं सम्पादय़िष्यसि ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं चापि तत्तथा कृष्ण सर्वं सम्पादय़िष्यसि ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
त्वं चापि तद्वेत्थ धनञ्जय़श्च; पुनर्द्यूताय़ागतानां सभां नः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं चापि तरुणी सुभ्रु रूपेणाप्रतिमा भुवि ||
२६ ख