वन पर्व
अध्याय
१३८
लोमश उवाच
त्वं चापि न यथापूर्वं कच्चित्क्षेममिहाश्रमे ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
त्वं चापि न यथापूर्वं प्रकृतिस्थो नराधिप |
९१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
त्वं चापि प्रतिय़ुध्येथा विजिगीषुव्रते स्थितः |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं चापि फलभाक्तात तपसः पार्थिवो ह्यसि |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
त्वं चापि मय़ि निष्क्रान्ते न शोकं कर्तुमर्हसि ||
२९ ग
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
त्वं चापि रत्नं नारीणां नरेषु च नलो वरः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
त्वं चापि रथिनां श्रेष्ठः स्वय़ं शूरोऽमितद्युतिः |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं चापि राजशार्दूल तपसोऽन्ते श्रिय़ा वृतः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैश्रवण उवाच
त्वं चाप्येभिर्हतैः सैन्यैः क्लेशं प्राप्स्यसि दुर्मते |
५७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
दुर्योधन उवाच
त्वं चाश्वसिहि कौन्तेय़ ये चाप्यनुगतास्तव |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
त्वं चेदिमं सर्वधर्मोपपन्नः; प्राप्तः क्लेशं पाण्डव कृच्छ्ररूपम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
त्वं चेद्राजन्नहुषं पराजय़े; स्तद्वै वय़ं भागमर्हाम शक्र ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
त्वं चेमं रथमास्थाय़ योद्धुमर्हो मतो मम ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
त्वं चैव क्रोधजस्तात पूर्वसर्गे सनातनः ||
५९ ग
विराट पर्व
अध्याय
१४
द्रौपद्यु उवाच
त्वं चैव देवि जानासि यथा स समय़ः कृतः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
त्वं चैव वरदो व्रह्मन्वरेप्सूनां भविष्यसि ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
त्वं चैव सौमदत्तिश्च कर्णश्चैव महारथः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
त्वं चैव हि नरश्रेष्ठ देवाश्चाग्निपुरोगमाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
त्वं चैवान्ये च विद्वांसस्तत्त्ववुद्धिविशारदाः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
त्वं चैवाहं च कौन्तेय़ नरनाराय़णौ स्मृतौ |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
त्वं चैवाहं च ये चान्ये त्वां राजन्पर्युपासते |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
त्वं चैवेमां यदा भुक्त्वा पृथिवीं त्यक्ष्यसे पुनः |
६३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
मरुत्त उवाच
त्वं चैवैतद्वेत्थ पुरन्दरश्च; विश्वेदेवा वसवश्चाश्विनौ च |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वं ज्योतिः सर्वभूतानां त्वमादित्यो विभावसुः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं तस्मान्मानुषी भूत्वा सूष्व पुत्रान्वसून्भुवि |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
त्वं तस्य गोप्ता च जनस्य राजा; षड्भागहर्ता शुभदुष्कृतस्य ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
त्वं तस्य राजशार्दूल प्रतिय़ोद्धा महाहवे |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं तावत्सहदेवात्र प्रव्रूहि कुरुनन्दन |
८ क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं तु केवलचापल्याद्वलदर्पोच्छ्रितः स्वय़म् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
त्वं तु केवलमस्त्रज्ञो वीरव्रतमनुष्ठितः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
त्वं तु केवलमौर्ख्येण विमूढो नाववुध्यसे |
६२ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं तु केवलवाल्येन धार्तराष्ट्र विदीर्यसे |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
त्वं तु गच्छ मय़ाज्ञप्तो जहि युद्धं घटोत्कचम् ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
त्वं तु जाता मय़ा दृष्टा दशार्णेषु पितुर्गृहे ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
त्वं तु दुष्प्रकृतिर्मूढो महाय़ुद्धेष्वकोविदः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
त्वं तु धर्ममतिर्नित्यं धर्मज्ञः सत्यसङ्गरः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
त्वं तु नित्यं गुणैर्हीनः किं ज्ञास्यस्यगुणो गुणान् ||
५४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वसुदेव उवाच
त्वं तु प्रत्यक्षदर्शी च कार्यज्ञश्च महाभुज |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
वलिरु उवाच
त्वं तु प्राकृतय़ा वुद्ध्या पुरन्दर विकत्थसे |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
त्वं तु प्राज्ञतमो लोके हित्वा धर्मं सनातनम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
त्वं तु मां मन्यसेऽशक्तं यथा कापुरुषं तथा |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
कर्ण उवाच
त्वं तु मित्रमुखः शत्रुर्मां भीषय़ितुमिच्छसि ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
त्वं तु मोहान्न जानीषे वाच्यावाच्यं सुय़ोधन ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
नारद उवाच
त्वं तु मोहान्न जानीषे वाय़ोर्वलमनन्तकम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
इन्द्र उवाच
त्वं तु यं प्रार्थय़स्येकं रक्ष्यते स महात्मना ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
त्वं तु वालिशय़ा वुद्ध्या ममेदमिति मन्यसे ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
त्वं तु वृद्धश्च विप्रश्च अशक्तश्चापि संय़ुगे |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं तु शुक्लाभिजातीय़ः परदोषेण कारितः |
२५ क