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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
ततः प्रणम्य तं देवं श्रेय़ोहर्षसमन्विताः |
१११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
ततः प्रणम्य वरदं देवं देवीमुमां तथा |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ततः प्रणम्य शिरसा मय़ोक्तस्तपतां वरः |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रणादः सञ्जज्ञे सर्वेषु कुरुवेश्मसु |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रणाममकरोत्केशवः पाण्डवस्तथा |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रणिहिते व्राह्मे मुहूर्ते शुभलक्षणे |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
ततः प्रणेदुः पाञ्चालाः प्रहृष्टाः साधु साध्विति ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रणेदुर्जहृषुश्च पाण्डवाः; समीक्ष्य पुत्रं पतितं क्षितौ तव |
६२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
ततः प्रणेमुर्देवास्ते वेपमानाः स्म शङ्करम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
नारद उवाच
ततः प्रतर्दनोऽप्याह वाक्यं क्षत्रिय़पुङ्गवः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रतापः सुमहाञ्शव्दश्चैव विभावसोः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रतिकृतं मन्ये विधानं सात्यकिं प्रति ||
२३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रतिचिकीर्षन्तमपसव्यं तु ते सुतम् |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रतिज्ञां समय़ं च तस्मै; जनार्दनः प्रीतमना निशम्य |
१०१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रतिज्ञास्थैर्यार्थं स मन्त्रो वहुलीकृतः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय १६७
गन्धर्व उवाच
ततः प्रतिनिवृत्तः स तय़ा वध्वा सहानघ |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
ततः प्रतिवचो देय़ं सर्वैरेव समाहितैः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
ततः प्रतिष्ठिते रामे वीरोऽय़ं याचितो मय़ा |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
ततः प्रतिष्ठितो धर्मो भविष्यति पुनस्तव ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रतिय़युर्देवाः प्रतिपूज्य धनञ्जय़म् |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १६८
गन्धर्व उवाच
ततः प्रतिय़यौ काले वसिष्ठसहितोऽनघ |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रतीतः कृष्णेन सहितः पाण्डवोऽर्जुनः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रतीतमनसस्ते नृपा भरतर्षभ |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रतीपो राजा स सर्वभूतहिते रतः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
ततः प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा पक्षिणस्ते समागताः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रत्यर्चितः सद्भिर्धर्मराजो युधिष्ठिरः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रत्यवहारोऽभूत्पाण्डवानां विशां पते |
९३ क
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रत्यवहारोऽभूत्सैन्यानां राघवाज्ञय़ा |
४० क
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
ततः प्रत्यव्रवीद्वाक्यमृषिर्मां क्रोधमूर्छितः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रत्यागतः कृष्णो धार्तराष्ट्रविसर्जितः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १६२
गन्धर्व उवाच
ततः प्रत्यागतप्राणस्तद्वलं वलवान्नृपः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रत्यागतप्राणा तावुभावपि दंशितौ |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रत्यागतप्राणाः सर्वे ते सुवलात्मजाः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
च्यवन उवाच
ततः प्रत्याहरत्कर्म मदं च व्यभजन्मुनिः |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रत्युपय़ातेषु पार्थिवेषु ततस्ततः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा देवर्षिं नारदं तदा |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा द्रोणं प्राय़ान्महाभुजः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा भ्रातॄन्धौम्यं च पाण्डवः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा रथेन रथिनां वरः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
ततः प्रदक्षिणीकृत्य कन्यास्तास्तमृषिं तदा |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रदक्षिणीकृत्य शिरोभिः प्रणिपत्य च |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
ततः प्रदध्मौ स करं प्रादुरासीत्ततो वलम् ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रदाय़ वह्वीर्गा व्राह्मणेभ्यो यदूद्वह |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रदीपिते देवैः पार्थतेजसि पार्थिव |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रदुद्रुवुः शेषाः पुत्रास्तव विशां पते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे विप्रसङ्घाः समन्ततः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
ततः प्रद्युम्नमनिरुद्धं चतुर्थ; माज्ञापय़त्यात्मय़ोनिर्महात्मा ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
ततः प्रधानमसृजच्चेतना सा शरीरिणाम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
ततः प्रध्माप्य जलजं पाञ्चजन्यमहं नृप |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रध्माप्य जलजं भेरीशतनिनादितम् |
२३ क