द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
त्वं वार्जुनो वा कृष्णो वा भिन्द्यात्प्रद्युम्न एव वा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं वासवसमुद्भूतो महावीर्यपराक्रमः ||
१८ ग
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वं विप्रैः सततमिहेज्यसे फलार्थं; वेदाङ्गेष्वतुलवलौघ गीय़से च |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
त्वं विभर्षि भुवं द्यां च सदैव वलसूदन ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
त्वं विष्णुरिति विख्यात इन्द्रादवरजो भुवि ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वं विष्णुस्त्वं सहस्राक्षस्त्वं देवस्त्वं पराय़णम् ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
त्वं वीर निधनं प्राप्तो नाथवान्सन्ननाथवत् ||
१८ ग
आदि पर्व
अध्याय
१८९
स्त्र्यु उवाच
त्वं वेत्स्यसे मामिह यास्मि शक्र; यदर्थं चाहं रोदिमि मन्दभाग्या |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं वै ज्येष्ठो ज्यैष्ठिनेय़ः पुत्र मा पाण्डवान्द्विषः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
प्रह्लाद उवाच
त्वं वै धर्मस्य विज्ञाता दैवस्येहासुरस्य च |
६५ क
सभा पर्व
अध्याय
६९
विदुर उवाच
त्वं वै धर्मान्विजानीषे युधां वेत्ता धनञ्जय़ः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
त्वं वै प्रभार्चिः पुरुषः सर्वस्य हृदि संस्थितः |
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
त्वं वै व्रह्मा च रुद्रश्च वरुणोऽग्निर्मनुर्भवः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
त्वं व्रह्मा सर्वदेवानां रुद्राणां नीललोहितः |
१५४ क
विराट पर्व
अध्याय
९
विराट उवाच
त्वं व्राह्मणो यदि वा क्षत्रिय़ोऽसि; समुद्रनेमीश्वररूपवानसि |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
त्वं शीघ्रं गच्छसीत्येकोऽव्रवीन्नेति तथापरः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
३२
व्रह्मो उवाच
त्वं शेष सम्यक्चलितां यथाव; त्सङ्गृह्य तिष्ठस्व यथाचला स्यात् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं सदा निय़ता कुर्या व्राह्मणस्याभिराधनम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं सदा संश्रय़ः शैल स्वर्गमार्गाभिकाङ्क्षिणाम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
त्वं सर्वभूतेषु वरेण्य ईड्य; स्त्वय़ा समं विद्यते नेह भूतम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वं सर्वममृतं देव त्वं सोमः परमार्चितः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
त्वं सारथे याहि जवेन वाहै; र्नय़ाम्येतान्धार्तराष्ट्रान्यमाय़ ||
१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं सिञ्चन्सर्पिषेवाग्निमुद्दीपय़सि सञ्जय़ ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
त्वं हि कर्ता विकर्ता च त्वं क्षरं चाक्षरं च हि |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वं हि कर्ता विकर्ता च भूतानामिह सर्वशः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाप्ययः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि कर्ता हृषीकेश संहर्ता चापराजितः ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि कर्ता हृषीकेश संहर्ता चापराजितः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
त्वं हि कृष्णाच्च कर्णाच्च फल्गुनाच्च विशेषतः |
१२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि कृष्णौ रणे शक्तः संसाधय़ितुमाहवे |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि केशव धर्मात्मा सत्यवान्सत्यविक्रमः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
त्वं हि क्षत्रिय़दाय़ादो महाकुलविवर्धनः |
६५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि गोविन्द धर्मार्थौ वेत्थ तत्त्वेन सर्वशः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
युधिष्ठिर उवाच
त्वं हि ज्ञाननिधिर्विप्रैरुच्यसे वेदपारगैः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
त्वं हि तस्य विनाशाय़ पर्याप्त इति मे मतिः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि तात ददास्येव व्राह्मणेभ्यः प्रय़ाचितः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
त्वं हि तात सुखादेव सुखमेष्यसि शोभनम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
३२
सूत उवाच
त्वं हि तीव्रेण तपसा प्रजास्तापय़सेऽनघ |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
त्वं हि देव महादेवः सर्वलोकनमस्कृतः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि देवान्सगन्धर्वान्ससुरासुरराक्षसान् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
आप ऊचुः
त्वं हि देवेश सर्वस्य जगतः परमो गुरुः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि देवेश्वरः साक्षात्त्वय़ा देय़ो वरो मम |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२३
सूत उवाच
त्वं हि देशान्वहून्रम्यान्पतन्पश्यसि खेचर ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
त्वं हि द्रष्टा च श्रोता च कृच्छ्रेष्वर्थकृतेष्विह |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि द्रोणविनाशाय़ समुत्पन्नो हुताशनात् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं हि धर्मः पवित्रं च यशः कीर्तिर्धृतिः स्मृतिः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं हि धर्मभृतां श्रेष्ठः सततं धर्मवत्सलः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
त्वं हि धर्मान्परान्वेत्थ तपांसि च तपोधन |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
युधिष्ठिर उवाच
त्वं हि नः परमो वक्ता लोकेऽस्मिन्भरतर्षभ |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि नः शरणं कृष्ण भक्तानामभय़ङ्करः ||
६३ ग