आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
निर्दिष्टा भवतां पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
निर्दिष्टान्नरदेवेन रथाञ्शीघ्रमय़ोजय़न् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
निर्देश्यकेन विधिना कालेनाव्यसनी भवेत् ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
निर्देष्टुं प्राणिभिः कैश्चित्प्राकृतैर्मांसलोचनैः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
सर्प उवाच
निर्दोषं दोषवन्तं वा न त्वा मृत्यो व्रवीम्यहम् |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
मैत्रेय़ उवाच
निर्दोषं निर्मलं चैव वचनं दानसंहितम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
निर्दोषं हि समं व्रह्म तस्माद्व्रह्मणि ते स्थिताः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
निर्दोषकर्मवचनात्सिद्धिः कर्मण एव सा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
निर्दोषा प्रतिभा ह्येनं कृत्स्ना समभिवर्तते |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
निर्द्वन्द्वं निर्गुणं नित्यमचिन्त्यं गुह्यमुत्तमम् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
निर्द्वन्द्वमिति यत्त्वेतत्तन्मे निगदतः शृणु |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
निर्द्वन्द्वा नित्यसत्त्वस्था विमुक्ता नित्यमाश्रिताः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
निर्द्वन्द्वा निर्नमस्कारा निराशीर्वन्धना वुधाः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
निर्द्वन्द्वाः सत्पथं प्राप्ता वालखिल्यास्तपोधनाः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
निर्द्वन्द्वेन विमुक्तेन मोक्षं समनुपश्यता ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वाहाकार एव च |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
निर्द्वन्द्वो निष्कलो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा व्रह्माश्रमपदे वसेत् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा सर्वतो मुक्त एव सः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
निर्द्वन्द्वो हि महावाहो सुखं वन्धात्प्रमुच्यते ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
निर्दय़ः सर्वभूतानां नित्यमुद्वेगकारकः |
४९ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
निर्धार्तराष्ट्रां पृथिवीं कर्तास्मि नचिरादिव ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
निर्धार्तराष्ट्रां हतसूतपुत्रा; मेतद्धि नः कृत्यतमं यशश्यम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
निर्भग्न इव वातेन कर्णिकारो हिमात्यये ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
निर्भग्नो देवराजश्च सहपुत्रः शचीपतिः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्भर्त्सनापवादैश्च तथैवाप्रिय़या गिरा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्भर्त्सय़न्तः शुचय़ो निजघ्नुः पापराक्षसम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
निर्भिदन्तौ हि गात्राणि विक्षरन्तौ च शोणितम् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
निर्भिद्य ते भीमवेगा न्यपतन्पृथिवीतले |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
निर्भिद्य दक्षिणं वाहुं निपपात महीतले |
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
निर्भिद्य दक्षिणं वाहुं प्राविशद्धरणीतलम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
निर्भिद्य देवकीपुत्रं क्षितिं जग्मुः शरास्ततः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
निर्भिन्द्यां येन रुष्टोऽहमपि मेरुं महागिरिम् ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
निर्भिन्नश्च शरैस्तेन द्विषता क्षिप्रकारिणा |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
निर्भिन्नहृदय़स्तूर्णं निपपात रथान्महीम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
निर्भिन्ने तु भुजे सव्ये सात्यकिः सत्यविक्रमः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
निर्भय़श्चापि शैलाग्रे वस त्वं सह वन्धुभिः ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
निर्भय़ा भरतश्रेष्ठमभ्यवर्तन्त फल्गुनम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
निर्भय़ा विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तमः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
निर्भय़ाः प्रतिपद्यन्ते यदा रक्षति भूमिपः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
निर्भय़ो भीमसेनोऽय़ं तं शाधि पुरुषर्षभ ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
निर्भय़ो वलवृत्रघ्नाच्चचार विजने वने ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
निर्मथ्यमानः सूक्ष्मत्वाद्रूपाणीमानि दर्शय़ेत् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
निर्मथ्यमानाः क्रुद्धेन भीमसेनेन दन्तिनः |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
निर्मनुष्यांश्च मातङ्गाञ्शय़ानान्पर्वतोपमान् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
निर्मनुष्यांश्च मातङ्गान्विरथांश्च महारथान् ||
६८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
निर्मनुष्यान्गजस्कन्धान्पादातांश्चैव विद्रुतान् ||
५० ख