शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि नस्तात सर्वेषां सर्वधर्मविदुत्तमः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
त्वं हि निर्जित्य भीष्मेण नीता प्रीतिमती तदा |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि नो वलवानेको यथा सततगस्तथा ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि पार्थ महावाहो श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि प्राणैः प्रिय़तरो ममाहं च सदा तव ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि भीष्म महावाहो वसूनां वासवोपमः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि मत्प्रभवो राजन्विदुरश्च ममांशभाक् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६१
गन्धर्व उवाच
त्वं हि मां प्रीतिय़ोगेन त्रातुमर्हसि भामिनि ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि मूलमनर्थानां वैरस्य कलहस्य च ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि मे युध्यतो नाद्य जीवन्मोक्ष्यसि माधव |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
त्वं हि मेऽत्यन्ततः शत्रुः सामर्थ्यान्मित्रतां गतः |
१५६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि यज्ञोऽक्षरः सर्वस्त्वं धर्मस्त्वं प्रजापतिः ||
२१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि राज्यविनाशं च द्विषद्भिश्च निराक्रिय़ाम् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि राष्ट्रस्य परमा गतिर्मत्स्यपतेः सुतः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि लुव्धतमो राजन्निकृतिज्ञश्च कौरव |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि वारय़िता श्रेष्ठः कुरूणां कुरुसत्तम |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
जनक उवाच
त्वं हि विप्रेन्द्र कार्त्स्न्येन मोक्षधर्ममुपाससे |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि शक्तो महेष्वास दातुमम्भो यथाविधि ||
१८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
त्वं हि शक्तो रणे जेतुं पाञ्चालानां वरूथिनीम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि शक्तो रणे जेतुं सकर्णानपि कौरवान् |
१०९ क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि शक्तो रणे जेतुं ससुरासुरमानवान् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि शक्तो रणे जेतुं ससुरासुरमानुषान् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
त्वं हि शाल्वप्रय़ुक्तेन पत्रिणाभिहतो भृशम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि संश्रूय़सेऽत्यर्थमसह्यवलविक्रमः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
त्वं हि संहारवुद्ध्या मे चिन्तिता रुषितेन च |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
त्वं हि सत्यव्रतः शूरो मित्राणामभय़ङ्करः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं हि सत्यव्रता देवी लोकस्य परमेश्वरी |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
त्वं हि सत्यव्रतो वीर पृथिव्यामिति नः श्रुतम् ||
९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि सर्वं विकुरुषे भूतग्रामं सनातनम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
युधिष्ठिर उवाच
त्वं हि सर्वकथारामस्त्वां चैवोपाश्रिता वय़म् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
जनमेजय़ उवाच
त्वं हि सर्वज्ञ दिव्यं च मानुषं चैव वेत्थ ह ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं हि सर्वस्नुषाणां मे श्रेय़सी धर्मचारिणी ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
देवा ऊचुः
त्वं हि सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
त्वं हि सर्वानवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि सर्वैर्गुणै राजन्देवानप्यतिरिच्यसे |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
त्वं हि सर्वैर्गुणैर्युक्तो देवताभ्योऽधिकः प्रभो |
१०५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
त्वं हि सौम्य कृतार्थोऽद्य निर्वृत्तार्थास्तथा वय़म् |
१५९ क
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
त्वं ह्यार्तानां समाश्वासो भीतानामभय़ङ्करः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
त्वं ह्येव कोपात्पृथिवीमपीमां; संवेष्टय़ेस्तिष्ठतु शार्ङ्गधन्वा |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
त्वं ह्येव धर्मशास्त्रेषु सूक्ष्मेषु परिनिष्ठितः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं ह्येवात्र भृशं गर्ह्यो धृतराष्ट्र सुतप्रिय़ः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
त्वक्च मांसं तथास्थीनि मज्जा स्नाय़ु च पञ्चमम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
त्वक्पत्रफलमूलानि वीर्यवन्ति भवन्ति च ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
त्वक्स्थश्चैव तथा वाय़ुः स्पर्शज्ञाने विधीय़ते ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
त्वगध्यात्ममिति प्राहुस्तत्त्ववुद्धिविशारदाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
त्वगन्तं देहमित्याहुर्विद्वांसोऽध्यात्मचिन्तकाः |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वगस्थिभूतः परिशुष्कमांसो; जटाजिनी वल्कलसंवृताङ्गः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
त्वगस्थिभूतां वेपन्तीं ततो भार्यामुवाच ताम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३०
भीष्म उवाच
त्वगस्थिभूतो धर्मात्मा स पपातेति नः श्रुतम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
त्वगस्थिभूतो हरिणश्चिन्ताशोकपराय़णः |
२ क