भीष्म पर्व
अध्याय
२८
अर्जुन उवाच
त्वदन्यः संशय़स्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
त्वदन्यो नेह सङ्ग्रामे कश्चिज्जीवति सञ्जय़ |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
त्वदन्यो हि रणे गोप्ता विजय़स्य न विद्यते ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
त्वदभिद्रोहसंय़ुक्तं युद्धमुत्पत्स्यते महत् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
त्वदर्थं पुरुषव्याघ्र जय़ो दैवे प्रतिष्ठितः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
त्वदर्थं पूज्यमानैषा रक्ष्यते परवीरहन् ||
३३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
त्वदर्थं प्रतिय़ोत्स्यामो राक्षसं तं महावलम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
त्वदर्थं मां स्थितं विद्धि त्वद्गतं हि मनो मम ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
वासुकिरु उवाच
त्वदर्थं रक्षिता पूर्वं प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४९
कुन्त्यु उवाच
त्वदर्थं वलिमादाय़ तस्य पापस्य रक्षसः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
त्वदर्थं विपुलश्रोणि न हि मेऽन्यत्प्रय़ोजनम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
त्वदर्थं व्रुवतां तात करिष्यन्ति वचो हितम् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
त्वदर्थं हि महावाहो रौद्ररूपं विभर्ति च ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६१
गन्धर्व उवाच
त्वदर्थं हि विशालाक्षि मामय़ं निशितैः शरैः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
त्वदर्थमद्य क्रिय़तां यद्वान्यदभिकाङ्क्षसे ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वदर्थमभिजल्पन्तं न तवास्त्यपराभवः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
त्वदर्थमवतीर्णास्मि पृथिवीं पृथिवीपते ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
त्वदर्थमागतं विद्धि देवेन्द्रं मां शुचिस्मिते ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
त्वदर्थमागता भद्रे क्षत्रिय़ाः प्रथिता भुवि ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
त्वदर्थमिति मन्येऽहं यथास्योदीर्यते वपुः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वदर्थमुपनीतानि नाग्रहीस्त्वं जनार्दन ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वदर्थसिद्ध्यर्थमभिप्रवृत्तौ; सुपर्णकेतुश्च शिनेश्च नप्ता |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
त्वदर्थे त्यक्ष्यति प्राणान्सह सैन्यो महारणे ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
त्वदर्थे सम्पराक्रान्तौ निहतौ सव्यसाचिना ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वदर्थोऽय़ं समारम्भः कृष्णवर्त्मन्नमोऽस्तु ते ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वदर्थय़ोगप्रभवप्रधानाः; समं करिष्याम परान्समेत्य ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वदाशामभिकाङ्क्षन्त्यः कृपणाः फलहेतुकाः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़मवधीत्सैन्यं सम्प्रद्रुतमहारथम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़ानां परेषां च घोरं विजय़काङ्क्षिणाम् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़ानां परेषां च रथेषु विविधान्ध्वजान् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़ाश्च पलाय़न्ते मृगाः सिंहार्दिता इव ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़ाश्चापरे राजन्वीरा वीरानवारय़न् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़ास्तव पुत्राश्च वीक्षमाणा दिशो दश |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़ास्तांस्तु सम्प्रेक्ष्य सर्वतः समभिद्रुतान् |
८४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़ास्तु ततो योधाः पाण्डवेय़ाश्च भारत |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़ेष्वप्यनीकेषु वादित्राण्यभिजघ्निरे ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़ैः पाण्डुपुत्राणां देवानामिव दानवैः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
त्वदीय़ैः पुरुषव्याघ्र योधमुख्यैर्महात्मभिः |
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
त्वदीय़ैः सह सङ्ग्राम आसीत्परमदारुणः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
दाश उवाच
त्वदूर्ध्वमभिषेक्तव्यो नान्यः कश्चन पार्थिव ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
त्वदृते पुरुषव्याघ्र य एतद्योधय़ेद्वलम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
युधिष्ठिर उवाच
त्वदृते मानवं नान्यं प्रष्टुमर्हामि कौरव ||
७७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
त्वदृते हि जगत्कृत्स्नं सद्यो न स्याद्धुताशन ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
त्वदृतेऽद्य महाभाग सर्ववेदविदां वर ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वद्गतिं गन्तुमिच्छामि प्रसीदस्व नय़स्व माम् ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वद्गुप्तो नागमत्कृष्ण भीमो वाह्वन्तरं मम ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वद्दर्शनं महावाहो तस्मादर्हति कौरवः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वद्दर्शनमभिप्रेप्सुरिह प्राप्तो विहाय़सा ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
त्वद्दर्शनात्तु विप्रर्षे कृतार्थं वेद्म्यहं द्विज |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
त्वद्दोषात्कुरवः क्षीणाः समासाद्य परस्परम् |
५१ क