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सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
त्वामेव कुरवो व्यक्तं प्रलम्भन्ते जनार्दन ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
त्वामेव गावोऽभि भवन्तु राज; न्दास्यः सनिष्का विविधं च रत्नम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
त्वामेव नाथमासाद्य निर्वृतिं परमां गताः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
त्वामेव भगवन्सर्वे प्रविशन्ति युगक्षय़े ||
१०९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
त्वामेव सर्वं विशति पुनरेव युगक्षय़े ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वामेव स्थापय़िष्यन्ति यौवराज्ये महारथाः |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
त्वामेव हि जिघांसन्तः प्राद्रवन्ति समन्ततः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
त्वामेवाद्य युय़ुत्सन्ते पश्य कालस्य पर्ययम् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
त्वामेवाभिमुखाः शूरा युद्धाय़ समुपास्थिताः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४०
उत्तर उवाच
त्वामेवाय़ं रथो वोढुं सङ्ग्रामेऽर्हति धन्विनम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वाष्ट्री तु सवितुर्भार्या वडवारूपधारिणी |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा कथितमत्यन्तं कर्णेन सह हृष्टवत् |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा कालोपसृष्टेन लोभतो नापवर्जिताः |
४३ क
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
त्वय़ा कीर्तय़तास्माकं भूय़ः प्रच्यावितं मनः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
त्वय़ा कुरूणां वर यत्प्रचोदितं; भवाभवस्येह परं निदर्शनम् |
९४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
ऋषय़ ऊचुः
त्वय़ा कृतं विसस्तैन्यं सर्वेषां नः शुनःसख ||
७६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा कृतममन्यन्त शत्रोर्वधमिमं जनाः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
त्वय़ा कृतां च मर्यादां नातिक्राम्यति कश्चन |
५९ क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
त्वय़ा कृतार्थः सगरः पुत्रवांश्च त्वय़ा पिता ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
व्रह्महत्यो उवाच
त्वय़ा कृतेय़ं मर्यादा लोकसंरक्षणार्थिना |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा गुप्तैरमित्रघ्न कृतः शत्रुगणक्षय़ः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा च तत्तथेत्युक्तमेतद्विश्वासकारणम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा च तत्तथेत्युक्तो जानीमो न च तद्वय़म् ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा च पार्थैश्च परस्परेण; प्रजाः शिवं प्राप्नुय़ुरिच्छति त्वय़ि |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
त्वय़ा च प्रागभिहितं देववाक्यार्थदर्शनात् |
४ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ा च प्लवगश्रेष्ठ तद्भुङ्क्ते पवनात्मजः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
भीष्म उवाच
त्वय़ा च लोकेन च सामरेण; तस्मान्न शाम्यन्ति महर्षिसङ्घाः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
त्वय़ा च विदिता विप्र कथमेवङ्गता सती ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
त्वय़ा च विपुलं राज्यं वलं धर्मः श्रुतं तथा |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ४४
दुर्योधन उवाच
त्वय़ा च सहितो राजन्नेतैश्चान्यैर्महारथैः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा चतुर्णां भ्रातॄणामभय़ं शत्रुकर्शन |
२५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा चाय़ं नरव्याघ्र गुरुशुश्रूषय़ा नृपः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
त्वय़ा चैव नरश्रेष्ठ तन्मे प्रीत्यानुमोदितम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा चैव महावाहो पाण्डवैः सह सृञ्जय़ैः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
त्वय़ा चैव व्रतं पार्थ वालेनैव कृतं पुरा |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
त्वय़ा चोपहृता राजन्क्षत्रिय़ा लोकवासिनः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२
शल्य उवाच
त्वय़ा जगदिदं सर्वं धृतं स्थावरजङ्गमम् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा जिता पाण्डव याज्ञसेनी; त्वय़ा च तोषिष्यति राजपुत्री |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
त्वय़ा तत्कुलवृद्धेन प्रत्यानेय़ं नरेश्वर ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा तस्य धनुश्छिन्नमात्मनाशाय़ दुर्मते ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा तु कथितं पूर्वं युद्धाय़ाभ्यागता वय़म् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
व्राह्मण उवाच
त्वय़ा तु तारितोऽस्म्यद्य किमन्यत्र तपोवलात् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय ७४
वृहदश्व उवाच
त्वय़ा तु धर्मभृच्छ्रेष्ठे शापेनाभिहतः पुरा |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा तु निहतः कर्णो धनुषा निशितैः शरैः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा तु पाण्डवेय़ेषु निहतेषु महामृधे |
३७ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
त्वय़ा तु सम्यग्वृत्तेन नित्यं धर्मार्थदर्शिना |
९३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६
वृहस्पतिरु उवाच
त्वय़ा त्यक्तं जगच्चेदं सद्यो नश्येद्धुताशन ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
त्वय़ा त्यक्ता गमिष्यामि यत्र यत्र विशां पते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
त्वय़ा त्यक्ता गमिष्यामि वलं यत्र ततो ह्यहम् ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
वामदेव उवाच
त्वय़ा त्रातं राजकुलं शुभेक्षणे; वरं वृणीष्वाप्रतिमं ददानि ते |
८० क