सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा त्रातोऽस्मि कौन्तेय़ व्रूहि किं करवाणि ते ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३२
व्रह्मो उवाच
त्वय़ा त्विदं वचः कार्यं मन्निय़ोगात्प्रजाहितम् ||
१८ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
त्वय़ा त्विह महत्कर्म देवानां पुरुषर्षभ |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा दग्धं हि तत्सैन्यं मय़ा विजितमाहवे ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
विष्णुरु उवाच
त्वय़ा दत्तमदत्तं कः कर्तुमुत्सहते विभो ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ा दत्तां न चेच्छेय़ं पृथिवीमखिलामहम् |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा दत्तामिमां व्यक्तं भोक्ष्यते स वसुन्धराम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा दत्तेन तोय़ेन भविष्यति हितं च मे ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा दाय़ादवानस्मि कैकेय़ीनन्दिवर्धन |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा दाय़ादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा दुर्मन्त्रितं द्यूतं सौवलेन च भारत ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ा देव प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानवाः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा देवासुरे युद्धे वधार्थममरद्विषाम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
कन्यो उवाच
त्वय़ा देवेन्द्र निर्दिष्टं पतिमिच्छामि दुर्जय़म् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
त्वय़ा द्वादश वर्षाणि वाय़ुभूतेन शुष्यता |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
अर्जुन उवाच
त्वय़ा धर्मार्थय़ुक्तं चेदुक्तं शिवमनामय़म् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
त्वय़ा धार्यन्ते सर्वभूतानि शक्र; त्वं देवानां महिमानं चकर्थ ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा न चैनां सफलां करोषि; देवव्रतं यन्न निहंसि युद्धे |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
त्वय़ा न वर्जितं मोहाद्यस्माद्वनमिदं मम |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ा नागपुरं गत्वा सभाय़ां धृतराष्ट्रजः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ा नाथेन गोविन्द किमु भीष्मं महाहवे ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा नाथेन गोविन्द ध्रुव एष जय़ो मम |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा नाथेन राधेय़ वचसा यदि सिध्यति ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा नाथेन वीरेण विदुषा परिपालितः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
त्वय़ा नाराय़णकथा श्रुता वै धर्मसंहिता ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा निसृष्टेन हतः शैनेय़ेन दुरात्मना ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
त्वय़ा निसृष्टैः पुरुषैराप्तकृद्भि; र्जले सर्वान्मज्जय़तीति नः श्रुतम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
त्वय़ा नृशंसकर्तारः पापाचाराश्च मानवाः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मातर ऊचुः
त्वय़ा नो रोचते स्कन्द सहवासश्चिरं प्रभो ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा परिषदो मध्ये श्लाघते स नराधिपः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा पापानि घोराणि समाचीर्णानि पाण्डुषु |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा पुनरनार्येण जिह्ममार्गेण पार्थिवाः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा पुनरनार्येण पूर्वं पार्थेन निर्जितः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
त्वय़ा पुरा दत्तमितीह शुश्रुम; नृप द्विजेभ्यः क्व नु तद्गतं तव ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा पुरुषशार्दूल दण्डेन मृदितः प्रभो ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ा पुरुषशार्दूल शार्दूलेन यथा रुरोः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
त्वय़ा पृष्टः किमहमन्यद्वदेय़; मेतत्कृत्वा कृतकृत्योऽसि राजन् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
त्वय़ा प्रलव्धं पश्यन्ति स्मय़न्त इव भामिनि ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्राह्मणा ऊचुः
त्वय़ा प्रोक्तानि कार्त्स्न्येन श्रुतानि प्रय़तेन ह ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
त्वय़ा भूमिः पुरा नष्टा समुद्रात्पुष्करेक्षण |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा मतिमतां श्रेष्ठ तन्मे शंस यथागमम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
त्वय़ा ममार्थः कल्याणि निर्विशङ्के तदाचर ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
त्वय़ा मां सहितं दृष्ट्वा प्रिय़ा भार्या सुताश्च ये |
१६५ क
वन पर्व
अध्याय
२९१
कुन्त्यु उवाच
त्वय़ा मे सङ्गमो देव यदि स्याद्विधिवर्जितः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा मे सदृशः पुत्रो न भूतो न भविष्यति ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा यशश्च राज्यं च सुखं चोत्तममिच्छता ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ा रणे निहतः सूतपुत्रः; कच्चिच्छेते भूमितले दुरात्मा |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा लोकगुरुः साक्षात्सर्वलोकपितामहः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
त्वय़ा लोकास्त्रय़ः क्रान्तास्त्रिभिर्विक्रमणैः प्रभो ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
त्वय़ा वा पीड्यते राष्ट्रं कच्चित्पुष्टाः कृषीवलाः ||
६६ ख