शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
सदाचारो मतो धर्मः सन्तस्त्वाचारलक्षणाः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
सदात्यमर्षी वलवान्न शक्यो; युद्धे जेतुं वासवेनापि साक्षात् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सदानिरामय़ां वृत्यां मन्दगां मन्दवाहिनीम् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सदानीरामधृष्यां च कुशधारां महानदीम् ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
सदापर्णः सदापुष्पः शुभाशुभफलोदय़ः |
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
सदापवादी व्राह्मणः शान्तवेदो; दोषैरन्यैर्यश्च युक्तो दुरात्मा ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
सदापुष्पफलैर्वृक्षैरुपेतां स्फटिकोपलाम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
सदाफलः सदास्रोतो मरुतां स्थानमुत्तमम् |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
सदारस्तां गुहामाशु प्रविवेश जलार्दितः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
सदारस्तामुपाकृत्य वने यातो महामुनिः ||
८९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
सदाराः सानुय़ात्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
सदारान्पाण्डवान्नित्यं प्रय़तोपचराम्यहम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
सदारास्तापसान्द्रष्टुं निर्ययुः पुरवासिनः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सदारो वाप्यदारो वा आत्मवान्संय़तेन्द्रिय़ः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
सदार्चितं चन्दनचूर्णशाय़िनं; सुवर्णनालीशय़नं महाविषम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
८२
यय़ातिरु उवाच
सदासतामतिवादांस्तितिक्षे; त्सतां वृत्तं चाददीतार्यवृत्तः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
सदास्तु सत्सु संन्यस्तं धनधान्यपरो भव ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
सदाहमार्यान्निभृतोऽप्युपासे; न मे विवित्सा न च मेऽस्ति रोषः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
सदिशं च नभः काय़ो वाय़ुर्मनसि मे स्थितः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
सदृशं कर्म ते दृष्ट्वा प्रीतिमानस्मि पुत्रक ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
सदृशं कर्मणस्तस्य फलं प्राप्नुहि पार्थिव |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
सदृशं दीय़तां मूल्यं व्राह्मणैः सह चिन्तय़ ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
सदृशं दीय़तां मूल्यं स्ववुद्ध्या निश्चय़ं कुरु ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
सदृशं दीय़तां मूल्यमृषिभिः सह चिन्त्यताम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
सदृशं पण्डितस्यैतदीषादन्तेन दन्तिना |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सदृशं मरणं ह्येतत्तव पुत्रस्य मा शुचः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
सदृशं मृगराजैतत्तव वाक्यं मदन्तरे |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
सदृशं रथनिर्घोषं मेने भैमी तथा हय़ाः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
सदृशं राजपुत्रस्य धन्विनश्च विशेषतः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
सदृशं वाहुवीर्येण कार्तवीर्यस्य पाण्डवम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
सदृशः फल्गुनेनासि कृष्णेन च महात्मना ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
सदृशस्त्रिषु लोकेषु ऋते धर्मात्मजौ युवाम् ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
सदृशाक्षसुतं वीर सस्यं वर्षन्निवाम्वुदः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
सदृशाक्षस्तव कथं शत्रुभिर्निहतो रणे ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
सदृशाच्छ्रेय़सो वा त्वं विद्ध्यपत्यं यशस्विनि ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
सदृशाञ्श्रेय़सश्चापि सर्वान्कर्णातिमन्यसे ||
५५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
दुर्योधन उवाच
सदृशानां मनुष्येषु सर्वेषां तुल्यजन्मनाम् |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
सदृशानि वपूंष्यन्ये तत्र तत्र व्यधारय़न् ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
सदृशान्पक्षिणो दृप्तः श्रेय़सश्चावमन्यते ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
सदृशीं प्रतिरूपस्य वासवस्य शचीमिव ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
सदृशैर्युध्य माद्रेय़ वचो मे मा विशङ्किथाः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
सदृशैस्तात युध्यस्व व्रीडां मा कुरु पाण्डव |
९४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
जनमेजय़ उवाच
सदृशो देवराजेन समृद्ध्या विक्रमेण च ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
सदृशो देवय़ोर्वीरः सहदेवः किलाश्विनोः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
सदृशो वासुदेवस्य विक्रमेण वलेन च ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सदृशो वृष्णिसिंहस्य केशवस्य महात्मनः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सदृशौ तौ महाराज मधुकैटभय़ोर्युधि ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
सदेवकेषु लोकेषु ये न वर्तन्ति मानवाः ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सदेवगन्धर्वमनुष्यचारणै; र्महर्षिभिर्यक्षमहोरगैरपि |
६३ क