वन पर्व
अध्याय
१३१
लोमश उवाच
तत्पाण्डवेय़ सदनं राज्ञस्तस्य महात्मनः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
तत्पातितशिरोवाहुकवन्धं भीमदर्शनम् |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
तत्पापं सुमहत्कृत्वा प्रतिय़ुध्यस्व भारत |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
तत्पारमेष्ठ्यस्य वचो निशम्य; नाराय़णः सात्वतधर्मगोप्ता |
५ क
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
तत्पुण्यं तत्परं व्रह्म तत्तीर्थं तत्तपोवनम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
तत्पुत्र चिन्ताकलितं यदुक्त; मनागतं वै तव सम्प्रतीह |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्पुत्रोऽस्यैवमेवैनमन्वय़ाचदमर्षणः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तत्पुनस्तुमुलं युद्धं प्राणांस्त्यक्त्वाभ्यवर्तत |
६३ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
तत्पुरं खचरं दिव्यं कामगं दिव्यवर्चसम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
तत्पुरं भरतश्रेष्ठ यथेन्द्रभवनं तथा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तत्पुरे चैकमेवास्य गृहं यदधितिष्ठति |
१३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तत्पौरुषमभूत्तत्र सूतपुत्रस्य दारुणम् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रकीर्णपताकानां रथवारणवाजिनाम् |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रकीर्णरथाश्वेभं नरवाजिसमाकुलम् |
६९ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
तत्प्रगृह्य मुनिश्रेष्ठो हृदय़ेनाभिमन्त्र्य च |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय
६४
उत्तर उवाच
तत्प्रणुद्य रथानीकं सिंहसंहननो युवा |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्रतिज्ञाय़ वचनं पाण्डवस्य जनार्दनः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
तत्प्रतिष्ठो रथो देव हय़ा योद्धा तथैव च |
१०४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्प्रत्ययकरं लव्ध्वा सुग्रीवं प्लवगाधिपम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्रधानात्मनस्तस्य भूमेः कृत्यं स्वय़म्भुवः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रभग्नं वलं दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रभग्नं वलं दृष्ट्वा कृतवर्मा महारथः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
तत्प्रभग्नं वलं दृष्ट्वा कौन्तेय़ेनामितौजसा |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रभग्नं वलं दृष्ट्वा द्रोणेनामिततेजसा |
६९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रभग्नं वलं दृष्ट्वा पिता देवव्रतस्तव |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रभग्नं वलं दृष्ट्वा मद्रराजः प्रतापवान् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रभग्नं वलं दृष्ट्वा शत्रुभिर्भृशमर्दितम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्रमाणं प्रमाणानां शाश्वतं भरतर्षभ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
तत्प्रमाणोऽवगाहेत तेन तत्साध्वसाधु वा ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
तत्प्रवक्ष्यामि ते सर्वं समाधाय़ मनः शृणु ||
५० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
तत्प्रविद्धं तदा भूमौ तथैव प्रत्यतिष्ठत |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
तत्प्रविश्य क्षुधाविष्टो गाधेः पुत्रो महानृषिः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्रविश्य राजा सह प्रिय़या सुधातलसुकृतां विमलसलिलपूर्णां वापीमपश्यत् ||
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
तत्प्रविश्य शिखण्डी सा द्रुपदस्यात्मजा नृप |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रवृत्तं निशाय़ुद्धं चिरं सममिवाभवत् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रसक्तमिवात्यर्थं युद्धमासीद्विशां पते ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्रसन्नेन मनसा प्रतिजग्राह शङ्करः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तत्प्रसादाच्च कामेभ्यः फलं प्राप्स्यसि पुत्रक ||
८४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रसादाद्धि त्रैलोक्यं प्राप्तं शक्रादिभिः सुरैः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्रस्थाप्यन्तु विद्वांसो व्राह्मणा वेदपारगाः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तत्प्राप्तमद्य मे युद्धे सूतपुत्रान्महारथात् ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्राप्तोऽसि महावाहो कस्माच्छोचसि पुत्रक ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
तत्प्राप्य कामं भजते क्रोधं च द्विजसत्तम ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्राप्य च वलो राजंस्तीर्थप्रवरमुत्तमम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
तत्प्राप्य प्रार्थय़े स्थानमव्ययं शाश्वतं ध्रुवम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्राप्य राज्यं कुरुपुङ्गवानां; शक्यं महत्प्राप्तमथ क्रिय़ाश्च ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
तत्प्रार्थय़न्ते पुरुषप्रवीराः; कुन्तीसुता माद्रवतीसुतौ च ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
तत्प्रीतिय़ुक्तेन गुणान्वितेन; पुत्रेण सत्पुत्रगुणान्वितेन |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
तत्प्रीत्या चैव सर्वेषां पौराणां हर्षसम्भवः |
७८ क