आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा ह्ययं सुतो राजन्मय़्युत्पन्नः सुरोपमः |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
त्वय़ा ह्यहं परित्राता तस्माद्घोराज्जटासुरात् |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
त्वय़ा ह्यहं सदा वत्स गुरोरर्थेऽभिपूजितः ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
महेश्वर उवाच
त्वय़ा ह्युक्तो विशेषेण प्रमाणत्वमुपैष्यति ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय
२५
अर्जुन उवाच
त्वय़ा ह्युपासिता नित्यं व्राह्मणा भरतर्षभ |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा ह्येतत्प्रतिज्ञातमैषीके यदुनन्दन |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा ह्येवादितः पार्था निकृता भरतर्षभ ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ाक्षिप्ता महावाहो दीप्यमानेव दृश्यते ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ाजय़त्सहाय़ेन पृथिवीं पाण्डवर्षभः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ाद्य राजान्वय़या मामनादृत्य यत्कृतः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
तार्क्ष्य उवाच
त्वय़ानुशिष्टोऽहमिहाद्य विद्यां; यदग्निहोत्रस्य व्रतं पुराणम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
त्वय़ान्यपूर्वय़ा नाहं भार्यार्थी वरवर्णिनि ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
त्वय़ापनीतो विवशो न जीवेय़ं कथञ्चन ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ापि प्रतिपत्तव्यं तथैव भरतर्षभ |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
त्वय़ापि सततं राजन्नभ्यर्च्यः पुरुषोत्तमः |
११९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
त्वय़ापि सुप्यतां भद्रे रजनी ह्यतिवर्तते ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
त्वय़ापो विहिताः पूर्वं त्वय़ि सर्वमिदं जगत् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
त्वय़ाभिगुप्तान्कौन्तेय़ान्नातिवर्तेय़ुरन्तिकात् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ाभिगुप्तो राधेय़ो विजेष्यति धनञ्जय़म् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
त्वय़ार्चितां मां देवेश पुरोधास्यन्ति देवताः ||
८० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ास्तास्तस्य मर्माणि भित्त्वा पास्यन्ति शोणितम् ||
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
सर्प उवाच
त्वय़ाहं चोदित इति व्रवीम्येतावदेव तु ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
त्वय़ाहं प्रथमं शप्तो वानरस्त्वं भविष्यसि |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
त्वय़ाहं हिंसितो यस्मात्तस्मात्त्वामप्यसंशय़म् |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
त्वय़ि कर्णश्च राज्यं च वय़ं चैव प्रतिष्ठिताः ||
१२८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
त्वय़ि कर्णे कृपे द्रोणे मद्रराजेऽथ सौवले |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
त्वय़ि क्षमा च धर्मश्च सत्यं चापि प्रतिष्ठितम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५२
नाग उवाच
त्वय़ि चाहं द्विजश्रेष्ठ भवान्मय़ि न संशय़ः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि चाहं पराश्वस्य प्रद्युम्ने वा महारथे |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
त्वय़ि चैव ह्यविश्वासे ममोद्वेगो भविष्यति ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि जीवति कौरव्य नाहं योत्स्ये कथञ्चन ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि जीवति गाङ्गेय़े द्रोणे च रथिनां वरे ||
३५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
प्रजा ऊचुः
त्वय़ि जीवति मा राष्ट्रं विनाशमुपगच्छतु ||
२७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि तिष्ठति कौरव्य यातनास्मान्न वाधते ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
त्वय़ि तिष्ठति दाशार्ह न नृशंस्यं कुतोऽनृजु ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
त्वय़ि तिष्ठति देवेश न विष्णुः कारणं मम |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि तिष्ठति सन्त्रासात्पलाय़ति समन्ततः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ि तुष्टे जगत्स्वस्थं त्वय़ि क्रुद्धे महद्भय़म् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि तुष्टे महाभाग सर्वलोकाभिपूजिते |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि त्वरोगे निर्मुक्ते क्लेशादस्मात्सवान्धवे |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि त्वरोगे निर्मुक्ते माता भ्राता च मे शिशुः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
७५
वृषपर्वो उवाच
त्वय़ि धर्मश्च सत्यं च तत्प्रसीदतु नो भवान् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९१
कुन्त्यु उवाच
त्वय़ि धर्मो यशश्चैव कीर्तिराय़ुश्च देहिनाम् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
त्वय़ि धर्मोऽर्जुने वीर्यं भीमसेने पराक्रमः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि नः पार्थ सर्वेषां सुखदुःखे समाहिते |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि पिण्डश्च कीर्तिश्च सन्तानं च प्रतिष्ठितम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
त्वय़ि पिण्डश्च कीर्तिश्च सन्तानं चावय़ोरिति ||
८७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ि पिण्डश्च तन्तुश्च धृतराष्ट्रस्य दृश्यते ||
९३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ि पुत्रशतं चैव सत्यवाञ्जनय़िष्यति |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि प्रकृतिमापन्ने शेषं स्यात्कुरुनन्दन ||
३३ ख