शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ि प्रतिगते श्रेय़ः कुतः श्रोष्यामहे वय़म् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
४३
अर्जुन उवाच
त्वय़ि प्रतिष्ठिते साधो रथस्थे स्थिरवाजिनि |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
कर्ण उवाच
त्वय़ि प्रशान्ते तु मम प्रभावं; द्रक्ष्यन्ति सर्वे भुवि भूमिपालाः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि प्रसन्ने यदि मित्रतामिय़ु; र्ध्रुवं नरेन्द्रेन्द्र तथा त्वमाचर ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि प्राणाः समाय़त्ताः कुरूणां कुरुनन्दन |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि भारत निष्क्रान्ते वनाय़ाजिनवाससि ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि भूमौ विनिहते शय़ाने रुधिरोक्षिते ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि मातर्विनष्टाय़ां न नः स्यात्कुलसन्ततिः ||
१२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि मोहसमापन्ने पाण्डवानभिधावति ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ि याते महावाहो संशप्तकवलं प्रति |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि वत्से पराश्वस्य व्राह्मणस्याभिराधनम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
४१
भगवानु उवाच
त्वय़ि वा परमं तेजो विष्णौ वा पुरुषोत्तमे |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि वाहं महावाहो प्रद्युम्ने वा महारथे |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१९४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि विक्रमसम्पन्नमिदं वचनमीदृशम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
त्वय़ि वुद्धिर्मतिर्लोकाः प्रपन्नाः संश्रिताश्च ये |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि वेदास्तथास्त्राणि त्वय़ि वुद्धिपराक्रमौ |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि वैक्लव्यमापन्ने संशय़ो विजय़े भवेत् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि व्यपाश्रय़ोऽस्माकं त्वय़ि भारः समाहितः |
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि शोकसमाविष्टे नृपाश्च सुहृदस्तव ||
६८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
त्वय़ि सम्प्रतिपत्स्यन्ते धर्मात्मा सत्यवागिति |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि सम्यङ्महावाहो प्रतिपन्ना यशस्विनः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि सर्वं महावाहो लोककार्यं प्रतिष्ठितम् ||
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि सर्वं समासक्तं त्वमेवैको जनेश्वरः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि सर्वमिदं विश्वं यदिदं स्थाणुजङ्गमम् |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
त्वय़ि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चासि वै |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
त्वय़ि सर्वे च दृश्यन्ते सुरा व्रह्मादय़ोऽनघ ||
११० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
ऋषिरु उवाच
त्वय़ि सर्वे स्म दृश्यन्ते सुरा व्रह्मादय़ोऽनघ ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ि सर्वेश सर्वेषामस्माकं भक्तवत्सल |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
त्वय़ि हव्यं च कव्यं च यथावत्सम्प्रतिष्ठितम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
दुर्योधन उवाच
त्वय़ि ह्यस्त्राणि दिव्यानि यथा स्युस्त्र्यम्वके तथा |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता ह्यहम् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ीष्टवति धर्मज्ञ विपाप्मा स्यामहं विभो |
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ेदानीं प्रहर्तव्यमेतल्लक्ष्यं निशम्यताम् ||
५८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ेय़ं पृथिवी राजन्किं न दत्ता तदैव हि ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ेय़ं पृथिवी लव्धा नोत्कोचेन तथाप्युत ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ैकेनापराद्धं मे सीतामाहरता वलात् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नारद उवाच
त्वय़ैतत्कथितं पूर्वं दैवं कर्तव्यमित्यपि |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
त्वय़ैतद्धि समाचीर्णं गौतमस्याश्रमे तदा ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
जनमेजय़ उवाच
त्वय़ैव कथितः पूर्वं सम्भवो द्विजसत्तम |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
त्वय़ैव वाला वर्धिताः शिक्षिताश्च; तवादेशं पालय़न्त्याम्विकेय़ ||
१०३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ैव ससुतेनाय़ं वाक्यवाय़ुसमीरितः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ैव सहिता यत्ता युय़ुधानरथं प्रति ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
त्वय़ैवमुक्ता च कथं समीप; मृषेर्न गच्छेय़महं सुरेन्द्र |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१०९
जनमेजय़ उवाच
त्वय़ैवांशावतरणे देवभागाः प्रकीर्तिताः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
त्वय़ोक्तानि निशम्याहं स्पृहय़ामि सचक्षुषाम् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ोक्ते पुरुषव्याघ्र द्रोणो ह्यासीत्पुरःसरः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ोक्तो नैष युध्येत जातु राजन्द्विजर्षभः |
१०४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
त्वय़ोक्तौ यौ तु तौ हेतू विशेषस्त्वत्र दृश्यते ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ोच्यमानः श्रेय़ोऽपि संरम्भान्न ग्रहीष्यति ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ोच्यमानाः कुरुषु राजमध्ये परन्तप ||
६९ ख