वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ोपगूढस्य च मे निद्रय़ापहृतं मनः |
६९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़्यद्य पिण्डः कीर्तिश्च कुलं चेदं प्रतिष्ठितम् |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़्यधीनं कुरुकुलं पिण्डश्च श्वशुरस्य मे ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़्यधीनः शमो राजन्मय़ि चैव विशां पते |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६१
गन्धर्व उवाच
त्वय़्यधीना हि मे प्राणाः किंनरोद्गीतभाषिणि |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़्ययुक्तान्यभाषन्त मूढा मूढममर्षणम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़्यस्य महती शङ्का न करिष्यति ते वचः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
त्वय़्यापो निहिताः सर्वास्त्वय़ि सर्वमिदं जगत् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
त्वय़्यावेशितभारोऽहं धृतिं प्राप्स्याम्यथाञ्जसा ||
८४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
त्वय़्याशंसन्त्यमरा मानवाश्च; वय़ं चापि प्रसृते पुण्यशीलाः ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
त्वय़्यासक्ता महावाहो लोका लोकेश्वराश्च ये ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़्याय़त्तो महावाहो शमो व्याय़ाम एव च ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़्येतद्वै विजानीहि जन्म कृष्णे यथा श्रुतम् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
त्वय़्येव तदहं मन्ये धर्माधर्मौ च केवलौ ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
त्वय़्येव तावत्तिष्ठन्तु हय़ा इत्युक्तवान्द्विजः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़्येव तावत्तिष्ठन्तु हय़ा गन्धर्वसत्तम |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
त्वय़्येवैतद्युक्तरूपं महत्कर्म धनञ्जय़ |
५६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
त्वय़्येवैतद्युक्तरूपं वचनं पार्थिवोत्तम ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
भीष्म उवाच
त्वय़्येवैतन्महाप्राज्ञ युक्तं निपुणदर्शनम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
त्सरुमार्गान्यथोद्दिष्टांश्चेरुः सर्वासु भूमिषु ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा कमलपत्राक्ष्या निय़ुक्तो द्यौस्तदा नृप |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१९८
धृतराष्ट्र उवाच
तय़ा च देवरूपिण्या कृष्णय़ा सह भारत ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
तय़ा च स्वागतेनोक्तौ विष्टरे संनिषीदतुः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
तय़ा चाप्यभवन्मिश्रो गर्भश्चास्याभवत्तदा |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
तय़ा चाहमनुज्ञातो भवांश्चापि प्रकीर्तितः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तय़ा जगदिदं सर्वमटन्त्या मिथिलेश्वरः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
तय़ा जघानाधिरथेः सदश्वान्साधुवाहिनः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
तय़ा ते मानुषं कर्म व्यपोढं भृगुनन्दन |
१५४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा ते समनुज्ञाता मातरं वीरमातरम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२८६
सूर्य उवाच
तय़ा त्वं कर्ण सङ्ग्रामे हनिष्यसि रणे रिपून् ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तय़ा त्वभिहतो भीमः पुत्रेण तव पाण्डवः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
तय़ा त्वभिहतो राजन्वेगवानपतद्भुवि |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा त्वामानय़िष्यामि निवासं स्वं शुचिस्मिते ||
२० ग
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तय़ा दत्तानि भोज्यानि पानानि विविधानि च |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
तय़ा धृत्या सूतपुत्रं जहि त्व; महं वैनं गदय़ा पोथय़िष्ये ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
तय़ा न विषय़ं मन्ये सर्वो वा विषय़ो मम |
११ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा निपातिता युद्धे स्वकर्मफलनिर्जिताम् |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
तय़ा परीतगात्रोऽहं मुमूर्षुर्नात्र संशय़ः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
तय़ा पुरीषमुत्सृष्टं व्राह्मणस्य तदोपरि ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
तय़ा प्रचोदितो राजा व्राह्मणान्वशवर्तिनः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा प्रय़ुक्तय़ा सम्यग्जगत्सर्वं प्रकाशते |
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तय़ा भिन्नतनुत्राणः प्रविश्य विपुलं तमः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
तय़ा वद्धमनश्चक्षुः पाशैर्गुणमय़ैस्तदा |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा विभक्तान्भागांस्ते भुञ्जते स्म पृथक्पृथक् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
तय़ा विरहितं हीदं शून्यमद्य गृहं मम ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
तय़ा विसृष्टो निर्गम्य स्वमेव भवनं यय़ौ |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा व्याससमासिन्या प्रीय़तां पुरुषोत्तमः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
४९
सूत उवाच
तय़ा शप्ता रुषितय़ा सुता यस्मान्निवोध तत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
ऋषिरु उवाच
तय़ा शुश्रूषय़ा सिद्धिं महतीं समवाप्स्यसि |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
तय़ा स काय़े निर्दग्धे मृत्युना प्रेत्य शुध्यति |
४५ ख