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द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
तय़ा स सन्धितो यस्माज्जरासन्धस्ततः स्मृतः ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
तय़ा स सम्यक्प्रतिनन्दितस्तदा; तथैव सर्वैर्विदुरादिभिस्ततः |
५२ क
वन पर्व
अध्याय २५२
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा समाक्षिप्ततनुः स पापः; पपात शाखीव निकृत्तमूलः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २५१
कोटिकाश्य उवाच
तय़ा समेत्य सौवीर सुवीरान्सुसुखी व्रज ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १००
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा सहोषितो रात्रिं महर्षिः प्रीय़माणय़ा ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा स्वजनगामीनि श्रावितो वचनानि सः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
तय़ा हतः पतितो वेपमानो; दुःशासनो गदय़ा वेगवत्या ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ा ह्युत्पादितः पुण्यः स ह्रदः सागरोपमः ||
२७ ग
वन पर्व
अध्याय २३०
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ामुह्यन्त कौरव्याश्चित्रसेनस्य माय़या ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
तय़ाहरद्दश धन्वन्तराणि; दुःशासनं भीमसेनः प्रसह्य |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ैव सहिता चापि पुत्रैरनुगता पृथा |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ैवं समनुज्ञातः पुत्रमादाय़ शन्तनुः |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
तय़ैवंविधय़ा राजन्पाञ्चाल्याहं सुमध्यया |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
युधिष्ठिर उवाच
तय़ोः किमाचरेद्राजन्पुरुषो धर्मनिश्चितः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः क्षणमिवापूर्णः सङ्ग्रामः समपद्यत |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः पक्षैः प्रपक्षैश्च निर्जग्मुर्वै युय़ुत्सवः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः पदानुगान्हत्वा पुनः पञ्चशतान्रथान् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोः पाणिं गृहीत्वा स रूपय़ौवनदर्पितः |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
तय़ोः पुण्यतरं दानं तद्द्विजस्य प्रय़च्छतः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोः पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः प्रतिभय़ं युद्धमासीद्राक्षससिंहय़ोः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः प्रभाः पृथिवीमन्तरिक्षं; सर्वा व्यतिक्रम्य दिशश्च वृद्धाः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः प्रभावमतुलं शृणु युद्धं च तद्यथा ||
४१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
विदुर उवाच
तय़ोः प्रश्नविवादोऽभूत्प्रह्लादं तावपृच्छताम् |
६१ क
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
तय़ोः प्रहरतोस्तुल्यं मत्तकुञ्जरय़ोरिव |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः प्रहर्षमालक्ष्य प्रहारांश्चातिमानुषान् |
११ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
तय़ोः प्रिय़ं मे कर्तव्यमिति जीवामि चाप्यहम् ||
९३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः प्रिय़े स्थितं चैव विद्धि मां राजपुङ्गव ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः प्रैक्षन्त संमर्दं संनिकृष्टमहास्त्रय़ोः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
तय़ोः शकलय़ोर्मध्यमाकाशमकरोत्प्रभुः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः शङ्खप्रणादेन तव सैन्ये विशां पते |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः शङ्खप्रणादेन रथनेमिस्वनेन च |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः शरैर्महाराज सम्पतद्भिः समन्ततः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोः शव्देन महता विवुद्धास्ते नरर्षभाः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
तय़ोः शशंस गृध्रस्तु सीतार्थे रावणाद्वधम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोः श्रुत्वा तु कथितमागच्छद्राक्षसाधमः |
८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
तय़ोः संलग्नय़ोर्युद्धे रुद्रनाराय़णात्मनोः |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः संवदतोरेव कृष्णदारुकय़ोस्तदा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तय़ोः संवदतोरेवं तथैवापन्नय़ोर्द्वय़ोः |
१०८ क
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोः संवदतोरेवं तदा पाण्डवय़ोर्द्वय़ोः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोः संवदतोरेवं पार्थगाङ्गेय़योस्तदा |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः संवदतोरेवं भीमसेनोऽव्रवीदिदम् |
१०० क
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
तय़ोः संवदतोरेवं राजन्रामाम्वय़ोस्तदा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
तय़ोः संवदतोरेवमाजगाम महामुनिः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १२२
द्रुपद उवाच
तय़ोः सख्यं विवाहश्च न तु पुष्टविपुष्टय़ोः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
तय़ोः सङ्ख्याय़ वर्षाग्रं व्राह्मे वक्ष्याम्यहःक्षपे ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
तय़ोः सन्धारणार्थं हि मामधोक्षजमञ्जसा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
तय़ोः सन्धिर्भिद्यते चेत्पुराण; स्ततः सर्वं भवति हि सम्प्रमूढम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोः समभवत्पुत्रो वृद्धय़ोः स महाभिषः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
तय़ोः समभवद्गर्भः फलप्राशनसम्भवः |
३३ क