chevron_left  चतुर्विंशकarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
चतुर्विंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमय़ो गुणः |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
चतुर्विंशतिकान्प्रश्नान्पृष्ट्वा वेदस्य पार्थिव |
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
चतुर्विंशतिपर्व त्वां षण्णाभि द्वादशप्रधि |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
चतुर्विंशतिमो व्यक्तो ह्यमूर्तः पञ्चविंशकः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
याज्ञवल्क्य उवाच
चतुर्विंशतिरुक्तानि यथाश्रुति निदर्शनात् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
चतुर्विंशतिरुद्दिष्टा गाय़त्री लोकसंमता ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
चतुर्विंशतिरेषा वस्तत्त्वानां सम्प्रकीर्तिता ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
चतुर्विंशतिसाहस्रीं चक्रे भारतसंहिताम् |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
चतुर्विंशन्महाराज शिक्षावलसमन्वितः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
चतुर्विंशमगाधं च षड्विंशस्य प्रवोधनात् ||
२० ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
चतुर्विंशात्मकं सोमं ये पिवन्ति च नित्यदा ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
चतुर्विंशे तु दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम् |
९६ क
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
चतुर्विधं च यद्भूतं सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय़्यं ते भविष्यति |
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्विधं धनुर्वेदमस्त्राणि विविधानि च |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
चतुर्विधं प्रजाजालं निर्दहत्याशु तेजसा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वासुदेव उवाच
चतुर्विधं प्रजाजालं संय़ुक्तो ज्ञानचक्षुषा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
चतुर्विधमिदं स्तोत्रं यः शृणोति नरः सदा |
१०३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
चतुर्विधवलां भीमामकम्प्यां पृथिवीमिव ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
चतुर्विधस्य भूतस्य सर्वस्येशाः स्वय़म्भुवः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
चतुर्विधा भिक्षवस्ते कुटीचरकृतोदकः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
चतुर्विधा मम जना भक्ता एवं हि ते श्रुतम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
चतुर्विधा हि लोकस्य यात्रा तात विधीय़ते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
चतुर्विधा ह्यर्थगतिर्वृहस्पतिमतं यथा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
चतुर्विधांश्च वैद्यान्वै सङ्गृह्णीय़ाद्विशेषतः ||
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
चतुर्विधानां भूतानां तडागमुपलक्षय़ेत् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्विधानां भूतानां त्रिषु लोकेषु माधवः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ११५
भृगुरु उवाच
चतुर्विधानि चास्त्राणि भास्करोपमवर्चसम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
चतुर्विधानि मित्राणि राज्ञां राजन्भवन्त्युत |
३ क
वन पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत्परमेष्ठिना |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
चतुर्विधेय़ं निर्दिष्टा अहिंसा व्रह्मवादिभिः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
चतुर्विधो हि लोकोऽय़ं योऽय़ं भूमिगुणात्मकः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
चतुर्विभक्तः पुरुषः स क्रीडति यथेच्छति |
२० क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्विषाणाः पद्माभाः कुञ्जराः सकरेणवः |
७७ क
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्तथैव च चतुर्मुखः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्वेदोद्गताभिश्च ऋग्भिस्तमभितुष्टुवे ||
१०० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
नारद उवाच
चतुर्षु राजवंशेषु सम्भूताः कुलवर्धनाः |
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
चतुर्षु हुतकल्पेषु राजसिंहमहाग्निषु |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
चतुर्ष्वङ्गेषु जगृहुः शार्दूलमिव पक्षिणः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
चतुर्ष्वाश्रमधर्मेषु योऽर्थः स च हृदि स्थितः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
चतुश्चित्यः स तस्यासीदष्टादशकरात्मकः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १३४
अष्टावक्र उवाच
चतुष्टय़ं व्राह्मणानां निकेतं; चत्वारो युक्ता यज्ञमिमं वहन्ति |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
चतुष्पथनिकेता च गोकर्णी महिषानना |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
चतुष्पथरता चैव भूतितीर्थान्यगोचरा |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
चतुष्पथश्मशानानि शैलांश्चान्यान्वनस्पतीन् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
चतुष्पथान्न सेवेत उभे सन्ध्ये तथैव च ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
चतुष्पथान्प्रकुर्वीत सर्वानेव प्रदक्षिणान् ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
चतुष्पदं द्विपदं चापि सर्व; मेवम्भूता गर्भभूता भवन्ति ||
११ ख