वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप |
९२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रविष्टे कौन्तेय़े सिन्धुराजजिघांसय़ा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
ततः प्रविष्टे राजेन्द्रे तस्मिन्राजनि तां पुरीम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रवीराः पाण्डूनां सर्वे कर्णमपीडय़न् |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रवीराः पाण्डूनामभ्यधावन्युधिष्ठिरम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रवुद्धः कौन्तेय़ः सर्वं सञ्छिद्य वन्धनम् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
ततः प्रवृत्तः सङ्ग्रामः समीपे लवणाम्भसः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रवृत्तः सुमहान्सङ्ग्रामः शोणितोदकः |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रवृत्ताः पुण्योदा नद्यः कुरुकुलोद्वह |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ततः प्रवृत्तातिशुभा स्वरव्यञ्जनभूषिता |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
ततः प्रवृत्ते सङ्ग्रामे विमिश्राः कुरुसोमकाः |
९९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
ततः प्रवृष्टस्तत्रासीद्यथापूर्वं सुरारिहा |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रवेशनं चक्रे तस्यां राजा युधिष्ठिरः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रवेश्य वार्ष्णेय़मुपवेश्य वरासने |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रव्यथिता भूमिर्व्यशीर्यत समन्ततः |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
ततः प्रव्यथितात्मासौ पुत्रशोकसमन्वितः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
ततः प्रव्यथितो दैत्यो ददावभ्यधिकं वसु ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रशीर्णे धनुषि शक्त्या शक्तिमतां वरः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
ततः प्रसन्ना पृथिवी तपसा तस्य पाण्डव |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
ततः प्रसन्नो भगवाननिर्दिष्टशरीरगः |
३५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
ततः प्रसन्नो भगवान्प्रास्यत्कोपं जलाशय़े |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
ततः प्रसन्नो भगवान्स्वागतेनाभिनन्द्य तान् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
ततः प्रसवसन्तानं चिन्तय़न्भगवानृषिः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रसादय़ामास पुनस्तं द्विजसत्तमम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
ततः प्रसादय़ामास पुनस्तमृषिसत्तमम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
११५
भृगुरु उवाच
ततः प्रसादय़ामास श्वशुरं सा पुनः पुनः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
ततः प्रसादय़ामासुः शर्वं ते विवुधोत्तमाः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
ततः प्रसादय़ामासुरुमां रुद्रं च ते सुराः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
ततः प्रसादय़ामासुरुमां रुद्रं च ते सुराः |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
ततः प्रसादय़ामासुर्यक्षा वैश्रवणं किल |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रसिष्विदे कृष्णः खिन्नश्चार्जुनमव्रवीत् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
ततः प्रसूता विद्वांसः शिष्टा व्रह्मर्षय़ोऽमलाः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२७
लोमश उवाच
ततः प्रस्थापय़ामास किमेतदिति पार्थिवः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
ततः प्रस्रुततोय़ं तं समीक्ष्य सलिलाशय़म् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहर्षः सैन्यानां पुनरासीत्तदा नृप ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रहसिताः सर्वे तेऽन्योन्यस्य तलान्ददुः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रहस्तः सहसा समभ्येत्य विभीषणम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रहस्य कर्णस्तं पुनरित्यव्रवीद्वचः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्य गोविन्दः साधु साध्वित्यथाव्रवीत् |
५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
जनक उवाच
ततः प्रहस्य जनकं व्राह्मणः पुनरव्रवीत् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
ततः प्रहस्य तद्भूतं तत्रैवान्तरधीय़त |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रहस्य दाशार्हः क्रोधपर्याकुलेक्षणः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्य नकुलश्चतुर्भिश्चतुरो रणे |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
ऋषभ उवाच
ततः प्रहस्य भगवांस्तनुर्धर्मभृतां वरः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
ततः प्रहस्य भगवाञ्जमदग्निरुवाच तम् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रहस्य वीभत्सुः पृथुधारेण कार्मुकम् |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रहस्य वीभत्सुर्दिव्यमैन्द्रं महारथः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्य वीभत्सुर्व्याक्षिपद्गाण्डिवं धनुः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्य वीभत्सुर्व्याक्षिपन्गाण्डिवं धनुः |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्य समरे नकुलस्य महारथः |
४५ क