भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्य समरे भीमसेनः परन्तपः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्य समरे भैमसेनिर्महावलः |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्याद्भुतदर्शनेन; गाण्डीवनिर्ह्वादमहास्वनेन |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्याधिरथिः शरजालानि मारिष |
८२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्याधिरथिरन्यदादत्त कार्मुकम् |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्याधिरथिर्विक्षिपन्धनुरुत्तमम् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्याधिरथिर्विधुन्वानः स कार्मुकम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्याधिरथिस्तूर्णमस्यञ्शिताञ्शरान् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहस्याशु नरप्रवीरो; रथं रथेनाधिरथेर्जगाम |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रहाय़ामरराजजुष्टा; न्पुण्याँल्लोकान्पतमानं यय़ातिम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
ततः प्रहृष्टः काकुत्स्थस्तथेत्युक्त्वा विभीषणम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
ततः प्रहृष्टवदनो भूय़ आरव्धवांस्तपः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रहृष्टां स्वां सेनामभिवीक्ष्याथ पाण्डवाः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहृष्टाः कुरुपाण्डुय़ोधा; वादित्रपत्राय़ुधसिंहनादैः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रहृष्टास्त्रिदशा वादित्राण्यभ्यवादय़न् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
ततः प्रहृष्टास्त्रिदशाः सगन्धर्वाः सचारणाः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रहृष्टो दाशार्हः पाण्डवश्च धनञ्जय़ः |
३० क
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
ततः प्रहृष्टो वीभत्सुः प्रादाद्धेमविषाणिनाम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
ततः प्राग्ज्योतिषं गत्वा पुनरेव व्यदृश्यत |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राग्ज्योतिषः क्रुद्धस्तोमरान्वै चतुर्दश |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राग्ज्योतिषः शक्तिं हेमदण्डामय़स्मय़ीम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राग्ज्योतिषो राजन्प्रहसन्निव भारत |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राग्ज्योतिषो राजा नागराजं समास्थितः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राग्ज्योतिषो राजा परिगृह्य द्विपर्षभम् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राग्ज्योतिषो राजा शरवर्षं निवार्य तत् |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राचीं दिशं भीमो यय़ौ भीमपराक्रमः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
ततः प्राञ्जलिरेवाहमस्त्रेषु गतमानसः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राञ्जलय़ः सर्वे व्राह्मणांस्तानपूजय़न् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
ततः प्राणः प्रादुरभूद्वाचमाप्याय़यन्पुनः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राणान्पुनर्लेभे पिता तव जनेश्वर |
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्राणान्विमोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
ततः प्रादात्पिता कन्यां रुरवे तां प्रमद्वराम् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रादीर्यत चमूर्धनञ्जय़शराहता |
१४ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रादुरभूच्छव्दः समिद्धस्य विभावसोः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
ततः प्रादुर्वभूवुस्ते सर्व एव युधिष्ठिर |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रादुश्चकारास्त्रमस्त्रमार्गविशारदः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रादुष्करोद्दिव्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रादुष्करोद्द्रोणो व्राह्ममस्त्रं परन्तपः |
७९ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राध्मापय़च्छङ्खं भेरीशतनिनादितम् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राध्मापय़ञ्शङ्खान्पाञ्चजन्यं च माधवः |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राप्तं त्वय़ा वीर ग्रहणं शत्रुभिर्वलात् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राप्तो महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
५३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
४
विदुर उवाच
ततः प्राप्तोत्तरे काले व्याधय़श्चापि तं तथा |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
ततः प्रालीय़तोदानः पुनश्च प्रचचार ह |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रावर्तत तदा आदौ कृतय़ुगं शुभम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
ततः प्रावर्तत द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रावर्तत नदी घोररूपा महाहवे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रावर्तत पुनः सङ्ग्रामः कटुकोदय़ः |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रासांश्च शक्तीश्च पुनरेव धनञ्जय़े |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रासादहर्म्येषु वसुधाय़ां च पार्थिव |
१ क