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शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खनिनादेन भेरीणां च महास्वनैः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शङ्खपदश्चापि पुत्रमात्मजमौरसम् |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खप्रणादश्च तूर्याणां च सहस्रशः |
४ क
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
ततः शङ्खमुपादाय़ देवदत्तं महास्वनम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शङ्खमुपाध्मासीद्द्विषतां लोमहर्षणम् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खमुपाध्माय़ त्वरय़न्वाजिनः स्वय़म् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खसहस्राणां निस्वनो हृदय़ङ्गमः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खसहस्राणि भेरीणामय़ुतानि च |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खांश्च भेरीश्च शतशश्चैव पुष्करान् |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च गोमुखाडम्वरास्तथा |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पेश्यश्च विविधाः परैः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्चानकैः सह |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्चानकैः सह |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
ततः शचीपतिर्वीरः पुनरेव व्यनश्यत |
२० क
स्त्री पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शतगुणं दुःखमिदं मामस्पृशद्भृशम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
ततः शतघ्नीश्च महागदाश्च; दीप्तांश्च शूलान्मुसलानसींश्च |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ततः शतपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससङ्ग्रहम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
ततः शतसहस्रांशुः समान इव सागरात् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
ततः शतसहस्रांशुरव्यक्तेनाभिचोदितः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
ततः शतसहस्राणि योधानामनिवर्तिनाम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
ततः शतसहस्राणि रथिनां सर्वशः प्रभो |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् |
६२ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
ततः शतसहस्रेण शराणां नतपर्वणाम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
ततः शतसहस्रेण सौभद्रं प्रपितामहः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
ततः शतसहस्रेण हय़ानां सुवलात्मजः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
ततः शतानीकमविध्यदाशुगै; स्त्रिभिः शितैः कर्णसुतोऽर्जुनं त्रिभिः |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
ततः शतानीकहता महागजा; हय़ा रथाः पत्तिगणाश्च तावकाः |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
ततः शतानीकहतान्महागजां; स्तथा रथान्पत्तिगणांश्च तावकान् |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शत्रुक्षय़ं कृत्वा सुमहान्तं रणे पितुः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शत्रुक्षय़ं कृत्वा सुमहान्तं रणे वृषः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
ततः शत्रुञ्जय़ं हत्वा पार्थः षड्भिरजिह्मगैः |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
ततः शत्रुरथं त्यक्त्वा भीमो ध्रुवरथं गतः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
ततः शरं महाघोरं ज्वलन्तमिव पावकम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
ततः शरं महाघोरं सूर्यपावकसंनिभम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
ततः शरं महाराज सर्वकाय़ावदारणम् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
ततः शरं समादाय़ यमदण्डोपमं शितम् |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
ततः शरः सोऽभ्यहनत्किरीटं तस्य धीमतः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
ततः शरद्वत्सुतसाय़कैर्हतः; सहैव नागेन पपात भूतले ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
ततः शरभसन्त्रस्ताः सर्वे मृगगणा वनात् |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
ततः शरमहाज्वालो वीर्योष्मा कर्णपावकः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
ततः शरशतं शल्यो मुमोचाशु युधिष्ठिरे |
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
ततः शरशतज्वालः सेनाकक्षं महारथः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
ततः शरशतेनाजौ धर्मपुत्रमवाकिरत् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
ततः शरशतेनास्य शतचन्द्रं समाक्षिपत् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
ततः शरशतेनैव युय़ुधानो महारथः |
२५ क