उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
ततः शिखण्डी तत्सर्वमखिलेन न्यवेदय़त् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
ततः शिखण्डी पाञ्चाल्यः पुंस्त्वमासाद्य पार्थिव |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
ततः शिखण्डी वेगेन प्रगृह्य परमाय़ुधम् |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ततः शिनीनामृषभः शितैः शरै; र्निकृत्य कर्णप्रहितानिषून्वहून् |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शिरांसि दीप्ताग्रैस्तेषां चिच्छेद पाण्डवः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ततः शिरोभिरवनिं स्पृष्ट्वा सर्वे च विस्मिताः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
ततः शिलां समुत्क्षिप्य भीमस्य युधि तिष्ठतः |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
ततः शिलाशितैस्तीक्ष्णैर्भल्लैः संनतपर्वभिः |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
ततः शिष्टेन सैन्येन समन्तात्परिवार्य तम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शिष्यान्समानीय़ आचार्यार्थमचोदय़त् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
ततः शीघ्रं जहौ शापं व्रह्मलोकमवाप च ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
ततः शीघ्रतरं प्राय़ात्केशवः सहसात्यकिः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
ततः शीघ्रतरं प्राय़ात्पाण्डवः सैन्धवं प्रति |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
ततः शीघ्रास्त्रविदुषोर्द्रोणसात्वतय़ोस्तदा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ततः शीतवनं गच्छेन्निय़तो निय़ताशनः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
ततः शीताम्वुसंय़ुक्ता दिव्यगन्धसमन्विता |
१६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
ततः शुकेति दीर्घेण शैक्षेणाक्रन्दितस्तदा |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शुक्लाम्वरधरः शुक्लय़ज्ञोपवीतवान् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ततः शुक्लाम्वराः स्नातास्तरुणाष्टोत्तरं शतम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ततः शुद्धान्तमासाद्य जानुभ्यां भूतले स्थितः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शुभं गिरिवरमीश्वरस्तदा; सहोमय़ा सिततटसानुकन्दरम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ततः शुभामापततीं स शक्तिं; विद्युत्प्रभां शान्तनवेन मुक्ताम् |
१०९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
ततः शुभाशुभं कृत्वा लभन्ते सर्वदेहिनः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वासुदेव उवाच
ततः शुभैः कर्मफलोदय़ैस्त्वं; समेष्यसे भीष्म विमुच्य देहम् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शुश्राव राजा स राक्षसेभ्यो महाभय़म् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
ततः शुष्केषु पर्णेषु पावकं सोऽभ्यदीदिपत् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
ततः शूद्राश्च वैश्याश्च यथास्वैरप्रचारिणः |
६१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
ततः शूराः समासाद्य समरे ते परस्परम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
ततः शूर्पारकं गच्छेज्जामदग्न्यनिषेवितम् |
४० क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शूर्पारकं चैव गणं चोपकृताह्वय़म् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
ततः शूर्पारकं देशं सागरस्तस्य निर्ममे |
५९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ततः शैक्याय़सीं गुर्वीं जातरूपपरिष्कृताम् |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
ततः शैक्याय़सीं गुर्वीं प्रगृह्य महतीं गदाम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
ततः शैक्याय़सीं गुर्वीं प्रगृह्य वलवद्गदाम् |
१०४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ततः शैनेय़पाञ्चाल्यौ द्रौपदेय़ाः प्रभद्रकाः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शैलोत्तमस्याग्रं चित्रमाल्यधरं शिवम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शैलोत्तमस्याग्रात्पाण्डवान्प्रति मारुतः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शोकपरीतात्मा सधूम इव पावकः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततः शोणहय़ः क्रुद्धश्चतुर्दन्त इव द्विपः |
१९ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शौरिं नृय़ुक्तेन वहुमाल्येन भारत |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
ततः श्येनकपोतीय़मुपाख्यानमनन्तरम् |
११५ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः श्रान्तं तु तद्रक्षो भीमसेनभुजाहतम् |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः श्रान्ताः पिपासार्ता निद्रान्धाः पाण्डुनन्दनाः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः श्रिय़ं तेजसा स्वेन दीप्ता; मादास्यसे पार्थिव कौरवेभ्यः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
ततः श्रुतमुपादाय़ श्रुतार्थमुपतिष्ठति ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ततः श्रुतर्वा सङ्क्रुद्धो धनुराय़म्य साय़कैः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
ततः श्रुताय़ुः सङ्क्रुद्धो राज्ञा केतुमता सह |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
ततः श्रुताय़ुर्वलवान्भीमाय़ निशिताञ्शरान् |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः श्रुतिपुराणज्ञाः शिक्षिता रक्तकण्ठिनः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः श्रुतो मय़ा चापि तवाख्येय़ोऽद्य भारत ||
१९ ग