वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
इतिहासमिमं चापि कलिनाशनमुच्यते |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
इतिहासमिमं चापि शृणु राजन्पुरातनम् |
२९ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसंमितम् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
इतिहासमिमं पुण्यं मोक्षधर्मार्थसंहितम् |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
इतिहासमिमं पुण्यं शृणुय़ाद्यः पठेत वा |
१०५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
इतिहासमिमं वृद्धाः पुराणं परिचक्षते |
६ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
इतिहासमिमं श्रुत्वा पुराणं शश्वदुत्तमम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
इतिहासमिमं श्रुत्वा पुरुषोऽपि सुदारुणः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
पराशर उवाच
इतिहासस्य कर्ता च पुत्रस्ते जगतो हितः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
इतिहासाः सवैय़ाख्या विविधाः श्रुतय़ोऽपि च |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
इतिहासे महापुण्ये वुद्धिश्च परिनैष्ठिकी ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
इतिहासोत्तमादस्माज्जाय़न्ते कविवुद्धय़ः |
२३७ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
इतिहासोत्तमे ह्यस्मिन्नर्पिता वुद्धिरुत्तमा |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
इतिहासोपवेदाश्च न्याय़ः कृत्स्नश्च वर्णितः ||
८२ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
इतिहासोपवेदाश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
इतिहासय़जुर्वेदौ पृष्ठरक्षौ वभूवतुः |
८१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
इतीदं कीर्तनीय़स्य केशवस्य महात्मनः |
१२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
इतीदं मनसा गत्वा प्रजासर्गार्थमात्मनः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
भीष्म उवाच
इतीदं वसुहोमस्य शृणुय़ाद्यो मतं नरः |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
धृतराष्ट्र उवाच
इतीदमभिगच्छामि व्यक्तमर्थाभिपत्तितः ||
१०६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
इतीदमालक्ष्य कुतो रतिर्भवे; द्विनाशिनो ह्यस्य न शर्म विद्यते ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
इतीदमुक्तं वृजिनाभिसंहितं; न चैतदेवं पुरुषः समाचरेत् |
६९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
इतीदमुक्तं स तदा महात्मना; जनार्दनेनामितविक्रमोऽर्जुनः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
इतीदमुक्तः स मुनिस्तदानीं; प्रत्याह यत्तच्छृणु राजसिंह |
३४ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
इतीदमुक्त्वा खड्गेन केशवस्य समीपतः |
२७ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
इतीदमुक्त्वा शिरसास्य पादौ; संस्पृश्य कृष्णस्त्वरितो जगाम ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
इतीदमुक्त्वा स महानुभाव; स्तपोनिधीनां निधिरप्रमेय़ः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
इतीमं विद्धि विंशत्या भूतानां प्रभवाप्ययम् ||
१०९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
इतीमं हृदय़ग्रन्थिं वुद्धिभेदमय़ं दृढम् |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
इतीव निश्चय़ो नाभूद्योधानां तत्र भारत ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
इतीव भूय़श्च सुहृद्भिरीरिता; निशम्य वाचः सुमनास्ततोऽर्जुनः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
इतीव मन्येत न भाषय़ेत; स वै चतुर्थो व्रह्मचर्यस्य पादः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
इतीव सञ्चिन्त्य सुरर्षिसङ्घाः; सम्प्रस्थिता यान्ति यथानिकेतम् |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
इतो गच्छस्व भद्रं ते पितुरेव निवेशनम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
इतो गते भीमसेने सात्वतं प्रति पाण्डवे |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
इतो गत्वा सञ्जय़ क्षिप्रमेव; उपातिष्ठेथा व्राह्मणान्ये तदर्हाः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
इतो दत्तेन जीवन्ति देवाः पितृगणास्तथा |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
इतो दुःखतरं किं नु यत्राहं मातरं ततः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
इतो दुःखतरं किं नु यदहं हीनवान्धवा |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
इतो दुःखतरं किं नु यन्मे माता सुखैधिता |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
इतो मय़ि गते भीरु गतः स भगवानिति |
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
इतो रत्नानि गाश्चैव दासीदासमजाविकम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
इतो वा विनिवर्तेय़ं गच्छेय़ं वा युधिष्ठिरम् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
इतो वा श्रेय़सी व्रह्मंस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
इतो हि नागलोको वै योजनानि सहस्रशः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
इतोऽप्यधर्मेण हतो भीष्मः कुरुपितामहः |
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
इत्थं च देशाननुसञ्चरामो; वनानि कृच्छ्राणि च कृच्छ्ररूपाः ||
१२ ख