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आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स मृगय़ामास वने तस्मिंस्तपोधनः |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
ततः स यज्ञं रौद्रेण विव्याध हृदि पत्रिणा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
ततः स यज्ञो नृपते वध्यमानः समन्ततः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
ततः स यत्नमातिष्ठदाचार्यस्तस्य वारणे |
११८ क
वन पर्व
अध्याय १२८
लोमश उवाच
ततः स याजय़ामास सोमकं तेन जन्तुना |
२ क
वन पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स यानादवरुह्य राजा; सभ्रातृकः सजनः काननं तत् |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स रत्नान्यादाय़ पुनः प्राय़ाद्युधां पतिः ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
ततः स रथमास्थाय़ ज्वलनार्कसमद्युतिः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
ततः स रथमास्थाय़ द्रुतमश्वानचोदय़त् |
८१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
ततः स रथिनां श्रेष्ठस्तव पुत्रस्य सारथिम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स रथिनां श्रेष्ठो रथेनैकेन वर्मभृत् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राक्षसः क्रुद्धः पाण्डवेन वलाद्धृतः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
ततः स राक्षसः क्रुद्धः सम्प्राप्यैवार्जुनिं रणे |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राक्षसः श्रुत्वा भीमसेनस्य तद्वचः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
ततः स राक्षसेन्द्रः स्वान्प्रेष्यानाह युधिष्ठिर |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राक्षसैर्वाचा प्रतिषिद्धः प्रतापवान् |
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
ततः स राजमार्गेण महता निर्ययौ वहिः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
ततः स राजर्षिरभूद्दुःखशोकसमन्वितः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
ततः स राजा कुशिकः सभार्यस्तेन कर्मणा |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा कौरव्यः कुन्तीपुत्रश्च वीर्यवान् |
२३ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा कौरव्यो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा कौरव्यो धृतराष्ट्रो महामनाः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
ततः स राजा च्यवनं मधुपर्कं यथाविधि |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
भीष्म उवाच
ततः स राजा जनको मन्त्रिभिः सह भारत |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा तं वीरं शरव्रातैः सहस्रशः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
ततः स राजा तच्छ्रुत्वा वचनं व्रह्मवादिनाम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
ततः स राजा तारुण्यादौरसेन वलेन च |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा द्युतिमान्स च सर्वो जनस्तदा |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
ततः स राजा द्रुपदः प्रच्छन्नाय़ा नराधिप |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा द्रुपदः प्रहृष्टः; पुरोहितं प्रेषय़ां तत्र चक्रे |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
ततः स राजा द्रुपदस्य श्रुत्वा; विमर्शय़ुक्तो युवतीर्वरिष्ठाः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
ततः स राजा नहुषो विस्मितः प्रेक्ष्य धीवरान् |
४१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा प्रददौ तापसार्थमुपाहृतान् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ४०
सूत उवाच
ततः स राजा प्रददौ वपुष्टमां; कुरुप्रवीराय़ परीक्ष्य धर्मतः |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २९
समुद्र उवाच
ततः स राजा प्रय़यौ क्रोधेन महता वृतः |
८ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः स राजा मतिमान्मत्वात्मानं वय़ोऽधिकम् |
७ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा मत्स्यानां विराटो वाहिनीपतिः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १९०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः स राजा मुदितो वभूव; वाम्यौ चास्मै सम्प्रददौ प्रणम्य ||
८२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा मेधावी विवक्षू प्रेक्ष्य तावुभौ |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
ततः स राजा राजेन्द्र स्कन्धे तस्य भुजङ्गमम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
ततः स राजा रात्र्यन्ते प्रतिवुद्धो महामनाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
ततः स राजा व्यपनीतकल्मषः; श्रिय़ा युतः प्रज्वलिताग्निरूपय़ा |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
ततः स राजा संहृष्टः सर्वं तदुपलभ्य च |
५० क
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः स राजा संहृष्टः सिद्धे पक्षे महामनाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
ततः स राजा सर्वेभ्यो द्विजेभ्यः पुरुषर्षभ |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
ततः स राजा सस्मार मामन्तर्गतमानसः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय २४८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा सिन्धूनां वार्द्धक्षत्रिर्जय़द्रथः |
११ क
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स रामं च जनार्दनं च; कार्ष्णिं च साम्वं च शिनेश्च पौत्रम् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
ततः स रुधिराक्ताङ्गो रुधिरेण कृतच्छविः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
ततः स लव्ध्वा तां भार्यां वरुणं प्राह धर्मवित् |
२९ क