आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संवरणात्सौरी सुषुवे तपती कुरुम् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः संवर्तको वह्निर्वाय़ुना सह भारत |
६० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
ततः संवर्तश्चित्यगतो महात्मा; यथा वह्निः प्रज्वलितो द्वितीय़ः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संवर्धय़ामास संस्कारैश्चाप्ययोजय़त् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संवादिते तस्मिन्ननुज्ञातो धनञ्जय़ः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ततः संवासजं स्नेहमृषिणा कुर्वता सदा |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
ततः संशप्तकव्रातान्साश्वद्विपरथाय़ुधान् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
ततः संशप्तका भूय़ः परिवव्रुर्धनञ्जय़म् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ततः संशप्तका राजन्समे देशे व्यवस्थिताः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ततः संशप्तकाः सर्वे परिवार्य धनञ्जय़म् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
ततः संशप्तकान्भूय़ः साश्वसूतरथद्विपान् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ततः संशप्तकान्हत्वा भूय़िष्ठं ये व्यवस्थिताः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
ततः संश्राव्यमाणेषु राज्ञां नामसु भारत |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
ततः संशय़ितं सर्वं भवेदिति मतिर्मम ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
ततः संसर्गजः स्नेहः पुत्रस्य तव पाण्डवैः |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संस्तीर्य रत्नैस्तामक्षानावाप्य सर्वशः |
४७ क
मौसल पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संस्तूय़ गोविन्दं कथय़ित्वा च पाण्डवः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
ततः संस्थाप्य समरे स्वान्यनीकानि सर्वशः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
ऋषभ उवाच
ततः संस्मृत्य तत्सर्वं स्मारय़िष्यन्निवाव्रवीत् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततः संहर्षय़न्सेनां सिंहवद्विनदन्मुहुः |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संहृत्य तत्तेजः प्रोवाचोत्तङ्कमीश्वरः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संहृत्य मुष्टिं तु पञ्चशीर्षमिवोरगम् |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संहृत्य विपुलं तद्वपुः कामवर्धितम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संहृष्टरोमाणः शव्दं तमभिदुद्रुवुः |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
ततः सखाय़ं गान्धारे मानय़न्पाकशासनम् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
ततः सगदमारोप्य मद्राणामधिपं रथम् |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
ततः सगदमारोप्य मद्राणामृषभं रथे |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
ततः सङ्कल्पवीर्येण कामेन विषय़ेषुभिः |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः सङ्कल्प्य पुत्रत्वे स्कन्दं मातृगणोऽगमत् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
ततः सङ्कीर्त्यमानेषु राज्ञां नामसु भारत |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
ततः सङ्कुलय़ुद्धेन तद्युद्धं व्यकुलीकृतम् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
कामन्द उवाच
ततः सङ्क्षय़माप्नोति तथा वध्यत्वमेति च ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
ततः सङ्ख्यातुमारव्धमदशद्दशमे पदे |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सङ्ख्यातुमारेभे तद्वचो गुणदोषतः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
ततः सङ्ग्रामभूमिं तां वर्तमाने जनक्षय़े |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततः सज्जो महाराज द्रौणिराहवदुर्मदः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
ततः सञ्चिन्त्य भगवान्देवो नाराय़णः प्रभुः |
९४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
ततः सञ्चिन्त्य भगवान्वरदानं महात्मनः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सञ्चिन्त्य मनसा मुहूर्तमिव वासवः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
ततः सञ्चिन्तय़ामास वंशकर्तारमात्मनः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
ततः सञ्चिन्तय़ामास श्राद्धकल्पं समाहितः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
ततः सञ्चुक्रुशुः पार्था ये च तेषां पदानुगाः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
ततः सञ्चुक्षुभे सैन्यं कुरूणां राक्षसार्दितम् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सञ्चोदय़ामास व्यासो धर्मात्मजं नृपम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सञ्चोदय़ामास सोऽर्जुनं भ्रातृनन्दनम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
ततः सञ्चोदय़ामास हय़ानस्य त्रिहाय़नान् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सञ्जज्ञिरे वीराः क्षिताविह नराधिपाः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
ततः सञ्जनय़ामास भूतग्रामं स वीर्यवान् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
ततः सञ्जातसन्त्रासानग्नेर्दर्शनलालसान् |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
ततः सञ्जाय़ते गन्धस्ततः सञ्जाय़ते रसः |
२५ क