शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
ततः समभवत्सर्वमक्षय़ाव्ययमव्रणम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
ततः समभवद्द्रोणः कुमारस्तस्य धीमतः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धं घोररूपं भय़ानकम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धं घोररूपं भय़ानकम् |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समभवद्युद्धं तेषां तस्य च भारत |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
ततः समभवद्युद्धं त्रैलोक्यस्य भय़ङ्करम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
ततः समभवद्युद्धं मम तस्य च भारत |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धं शुक्राङ्गिरसवर्चसोः |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धं संसक्तं तत्र तत्र ह |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धं सन्ध्याय़ामतिदारुणम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धमतीव भय़वर्धनम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धमाकुलं भरतर्षभ |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
ततः समभवद्रक्षो घोराक्षं भीमदर्शनम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
ततः समभवन्नारी तस्या रूपेण संमिता |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
ततः समस्ता इन्द्राणीं देवाः साग्निपुरोगमाः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समस्तानि किरीटमाली; वनेषु वृत्तानि गदाग्रजाय़ |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समस्तास्ते सर्वे तुरगानभ्यचोदय़न् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
ततः समाकुले तस्मिन्वर्तमाने महाभय़े |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
ततः समागमो घोरो वभूव सहसा तय़ोः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
ततः समागमो राजन्कुरुपाण्डवसेनय़ोः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समाजो ववृधे स राजन्दिवसान्वहून् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समाधाय़ स वेदपारगो; जुहाव मन्त्रैर्ज्वलितं हुताशनम् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
ततः समानः प्रालिल्ये पुनश्च प्रचचार ह |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
ततः समाने प्रतितिष्ठतीह; इत्येव पूर्वं प्रजजल्प चापि |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समानय़ामास धृतराष्ट्रः सुहृज्जनम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समाप्तभूय़िष्ठे तस्मिन्कर्मणि भारत |
२६ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
ततः समापय़ामासुः कर्म तत्तस्य याजकाः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समासाद्य महाजनौघाः; कुरुप्रवीरं परिवार्य तस्थुः |
८ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समासाद्य महानुभावः; कृष्णस्तदा दारुकमन्वशासत् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
ततः समुत्थाय़ स राजपुत्रः; श्रुत्वा भ्रातुः कोपविरक्तदृष्टिः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
ततः समुत्थाय़ सुदुर्मनाः सा; विवर्णमामृज्य मुखं करेण |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
ततः समुत्पन्नमिदं प्रस्वापं युज्यतामिति ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समुत्पेतुरुदाय़ुधास्ते; महीक्षितो वद्धतलाङ्गुलित्राः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
ततः समुत्सृज्य धनुः सवाणं; युधिष्ठिरं वीक्ष्य भय़ाभिभूतम् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समुदिते लोके मानुषे भरतर्षभ |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
ततः समुद्ग्रथ्य सितेन वाससा; स्वमूर्धजानव्यथितः स्थितोऽर्जुनः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः समुद्धृतप्राणं गतश्वासं हतप्रभम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समुद्यतां दृष्ट्वा देवेन्द्रेण महाशनिम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम् |
९७ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः समुद्रः स्वां वेलामतिक्रामति भारत |
७४ क
वन पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समुद्रतीरेण जगाम वसुधाधिपः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समुद्रतीरेण वङ्गान्पुण्ड्रान्सकेरलान् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समुद्रे तीर्थानि दक्षिणे भरतर्षभः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
ततः समुदय़ं कृत्वा वलानां राजसत्तमः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
ततः समुपविष्टं तत्सुमहद्राजमण्डलम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
ततः समुपविष्टेषु तेषु राजसु भारत |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
ततः समूलो ह्रिय़ते नदीकूलादिव द्रुमः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समृद्धं प्रथमं विशोकः; प्रपत्स्यसे नागपुरं सराष्ट्रम् ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः समेत्य नकुलं पर्यपृच्छन्त ते द्विजाः |
९ क