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विराट पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्हितं ततस्तस्या रक्षो रक्षार्थमादिशत् |
२० क
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
अन्तर्हितं ततो भूतमुवाचेदं पुनर्वचः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
अन्तर्हितं माय़याभूत्ततोऽहं विस्मितोऽभवम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्हितं राक्षसं तं विदित्वा; सम्प्राक्रोशन्कुरवः सर्व एव |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तर्हितं विदित्वा तं वहुमाय़ं च राक्षसम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्हितं समालक्ष्य प्रहरन्तमथार्जुनः |
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अन्तर्हितः क्षणे तस्मिन्सगणो भीमपूर्वज ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तर्हितः प्रकाशो वा दिव्यैर्दत्तवरैः शरैः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
अन्तर्हितः प्रभावं तु दर्शय़ित्वा शुकस्तदा |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
अन्तर्हितश्चास्मि पुनः पुनरेव च ते गृहे |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
अन्तर्हितस्ततो भूय़श्च्यवनः शय़नं च तत् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्हिता गाण्डिवनिस्वनेन; भभूवुरुग्राश्च रणप्रणादाः ||
११४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्हिता तदा वाणी मेघदुन्दुभिनिस्वना ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्हिता महानादाः श्रूय़न्ते भरतर्षभ |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
अन्तर्हिताः सोपहिताः सर्वे ते परसाधनाः ||
७५ ख
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तर्हितानां भूतानां दर्शनार्थं परन्तप ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अन्तर्हितानां भूतानां निस्वनस्तुमुलोऽभवत् ||
७६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्हितानि भूतानि प्रकाशानि च सङ्घशः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय १४१
युधिष्ठिर उवाच
अन्तर्हितानि भूतानि रक्षांसि वलवन्ति च |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
अन्तर्हितानि वा यानि तानि शृण्वन्तु मे वचः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
अन्तर्हिताभितप्तानां यथाशक्ति वुभूषताम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
अन्तर्हितास्तापसास्ते साग्निहोत्राश्रमास्तदा ||
९१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५१
वासुदेव उवाच
अन्तर्हितास्त्वां प्रतिपालय़न्ति; काष्ठां प्रपद्यन्तमुदक्पतङ्गम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २७७
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तर्हिताय़ां सावित्र्यां जगाम स्वगृहं नृपः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अन्तर्हिते भगवति सानुगे यादवेश्वर |
७२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
अन्तर्हितोऽभूद्राजेन्द्र ततो राजापतत्क्षितौ ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्हितौ चेरतुस्तौ भृशं विस्मय़कारिणौ ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
अन्तवद्भिरुत प्राज्ञः क्षत्रय़ज्ञैः पिशाचवत् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
अन्तवन्त इमे देहा भूतानाममराधिप |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
जनक उवाच
अन्तवन्त इहारम्भा विदिताः सर्वकर्मसु |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
अन्तवन्तः क्षत्रिय़ ते जय़न्ति; लोकाञ्जनाः कर्मणा निर्मितेन |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
अन्तवन्ति च भूतानि गुणय़ुक्तानि पश्यतः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
अन्तवन्ति प्रदानानि पुरा श्रेय़स्कराणि च |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
अन्तवन्ति हि कर्माणि सेवन्ते गुणतः प्रजाः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तश्चरति भूतानां मातरिश्वा सदागतिः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
अन्तश्चाकाशमेव स्याल्लोकोऽय़ं दस्युसाद्भवेत् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
अन्तश्चादिमतां दृष्टो न चादिर्व्रह्मणः स्मृतः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
अन्तश्चादिश्च मध्यं च कृत्यानां च प्रपञ्चनम् |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ताखीं चैव रोमां च यवनानां पुरं तथा |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ताय़ कृत्वा गन्धर्वो दिवमाचक्रमे ततः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
पिङ्गलो उवाच
अन्तिके रमणं सन्तं नैनमध्यगमं पुरा ||
४८ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
जनमेजय़ उवाच
अन्ते वा कर्मणः कां ते गतिं प्राप्ता नरर्षभाः |
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
अर्जुन उवाच
अन्ते विहितमस्त्राणामेतत्कवचधारणम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अन्तेवासिनमाचार्यो जिघांसुः पुत्रसंमितम् ||
१५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अन्तेवासिनमाचार्यो महेष्वासं समर्दय़त् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तेषु पुत्रान्निक्षिप्य यदुद्रुह्युपुरोगमान् |
९१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे |
९६ क
आदि पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तेषु स विनिक्षिप्य पुत्रान्यदुपुरोगमान् |
११ क