शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
ततः सृष्टानि तत्रैव तानि यान्ति पुनः पुनः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
ततः सेनापतिं कृत्वा कृष्णस्य वशवर्तिनम् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सेनापतिं कृत्वा भीष्मं परवलार्दनम् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सेनापतिं चक्रे विधिवद्भूरिदक्षिणम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ततः सेनापतिः शीघ्रमय़ं काल इति व्रुवन् |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
ततः सेनापतिरभूत्कर्णो दौर्योधने वले |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
ततः सेनापतिरभूद्द्रोणोऽस्त्रविदुषां वरः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
ततः सेनापती राजन्पाण्डवस्य महात्मनः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ततः सेनामुखे कर्णं दृष्ट्वा राजा युधिष्ठिरः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
ततः सेनामुखे तस्मिन्स्थितः पार्थो धनञ्जय़ः |
७४ क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सेनामुपादाय़ पाण्डुर्नानाविधध्वजाम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
ततः सैनिकमुख्यास्ते प्रशशंसुर्नरर्षभौ |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सैन्धवकान्योधान्विनिर्जित्य नरर्षभः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
ततः सैन्धवको राजा क्षुद्रस्तात जय़द्रथः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
ततः सैन्धवको राजा द्रुपदं विशिखैस्त्रिभिः |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततः सैन्धवमालोक्य कार्ष्णिरुत्सृज्य पौरवम् |
५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सैन्धवय़ोधास्ते पुनरेव व्यवस्थिताः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सैन्यं समावृत्य मत्स्यराजसुशर्मणोः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
ततः सैन्यान्यकम्पन्त धृष्टद्युम्नसुते हते |
६३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततः सैन्यास्तव विभो मद्रराजपुरस्कृताः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
ततः सैन्येषु भग्नेषु मथितेषु च सर्वशः |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
ततः सैन्येषु राजेन्द्र शव्दः समभवन्महान् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सोऽतित्वरः कृष्णो विवेशान्तःपुरं तदा |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सोऽनिमिषो भूत्वा राजानं समुदैक्षत |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सोऽन्तर्दधे भूय़ः प्राप्ते त्रेताय़ुगे पुनः ||
३५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सोऽन्तर्दधे भूय़ो नाराय़णमुखोद्गतः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सोऽन्तर्दधे भूय़ो नाराय़णसमाहितः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
ततः सोऽन्तर्हितो वाहुः पितुर्मम नराधिप |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
ततः सोऽभ्यद्रवद्देवान्क्रुद्धो रौद्रपराक्रमः |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
ततः सोऽवभृथे राजा मुदितो जनमेजय़ः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
ततः सोऽस्त्रेण शैलेन्द्रो विक्षिप्तो वै व्यनश्यत ||
६९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः सौभद्रमासाद्य महर्षेस्तीर्थमुत्तमम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
ततः सौभवधाय़ाहं प्रतस्थे पृथिवीपते |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
ततः सौम्येन मन्त्रेण द्रोणपुत्रः प्रतापवान् |
५२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्त्रिय़ः कौरवपाण्डवानां; याश्चाप्यन्याः कौरवराजवंश्याः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
ततः स्त्रिय़स्ता भूतं च सर्वमन्तरधीय़त ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
सूत उवाच
ततः स्थ पतितारोऽत्र गर्ते अस्मिन्नधोमुखाः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
ततः स्थलगतं दृष्ट्वा तत्राप्यात्मानमात्मना |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्थाणुं महावेगं महापारिषदं क्रतुम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ततः स्थाणुवटं गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |
१५५ क
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
ततः स्थित्वा नरश्रेष्ठं भगीरथमुवाच ह |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
ततः स्नातः शुचिर्भूत्वा कृतकौतुकमङ्गलः |
६० क
आदि पर्व
अध्याय
३०
सूत उवाच
ततः स्नातुं गताः सर्पाः प्रत्युक्त्वा तं तथेत्युत |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
ततः स्निग्धाम्वुदाभासं वेदव्यासमकल्मषम् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
ततः स्नुषां स भगवान्प्रहृष्टो भृगुरव्रवीत् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्नेहाद्धरिहय़ं दृष्ट्वा रङ्गावलोकिनम् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
ततः स्पन्दय़तेऽङ्गानि स गर्भश्चेतनान्वितः ||
७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ततः स्पृष्टोदकं पार्थं विनीताः परिचारकाः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्फाटिकतोय़ां वै स्फाटिकाम्वुजशोभिताम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
ततः स्म समतां याता मर्त्यैस्त्रिभुवनेश्वर ||
२५ ख