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कर्ण पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
ततः स्मृत्वा भीमसेनस्तरस्वी; सापत्नकं यत्प्रय़ुक्तं सुतैस्ते |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
ततः स्मय़न्ती पाणिभ्यां नर्मार्थं चारुदर्शना |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
ततः स्मय़न्निव द्रौणिर्वज्रमस्त्रमुदीरय़त् |
७० क
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्रस्तोत्तरपटः सप्रस्वेदः सवेपथुः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
ततः स्वं स्थानं प्राप्स्यतीति ||
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
ततः स्वकुलरक्षार्थमहं त्वा समुपागमम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्वगोचरे न्यस्य मनो वुद्धीन्द्रिय़ाणि च |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्वचरणे वृद्धः संमतोऽर्थविशारदः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
ततः स्वतेजसाविष्टाः केशा नाराय़णस्य ह |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथनीडस्थः स्वरथस्य रथेषय़ा |
१३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथमारुह्य पुनरेव महारथः |
११५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथमारोप्य पाञ्चाल्यमरिमर्दनः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथमारोप्य पौरवं तनय़स्तव |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथमारोप्य लक्ष्मणं गौतमस्तदा |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथमास्थाय़ जाम्वूनदविभूषितम् |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथमास्थाय़ पाञ्चाल्योऽन्यच्च कार्मुकम् |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथमास्थाय़ भीमसेनो महावलः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरेण महता विननाद महास्वनम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
ततः स्वर्गगतः पक्षी भार्यया सह सङ्गतः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
ततः स्वर्गमवाप्नोति विमुक्तः सर्ववन्धनैः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
ततः स्वर्गस्थमात्मानं सोऽपश्यद्विगतज्वरः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
ततः स्वल्पेन कालेन तुष्टो जलधरस्तदा |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वशिविरं गत्वा न्यविशंस्तत्र भारत |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वशिविरं गत्वा पाण्डवाः कुरवस्तथा |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वशिविरं प्राप्तौ हतानन्दं हतत्विषम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
ततः स्वशिविरं प्राप्य व्यतिष्ठन्सहसैनिकाः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः स्वसैन्यमालोक्य वध्यमानमरातिभिः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततः स्वस्तिपुरं गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप |
१५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
ततः स्वागतमित्याह तत्तेजः स पितामहः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्वारोचिषः पुत्रं स्वय़ं शङ्खपदं नृप |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय २५
कश्यप उवाच
ततः स्वार्थपरान्मूढान्पृथग्भूतान्स्वकैर्धनैः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत्परमः स्मृतः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत्परमः स्मृतः ||
१७ ग
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्वेदः क्लमस्तन्द्री ग्लानिश्च भजते नरान् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १००
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्वैर्भूषणैर्दासीं भूषय़ित्वाप्सरोपमाम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
ततः स्वोरसि विन्यस्य वक्त्रं तस्य शुभानना |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
ततः स्वय़ं दर्शितवान्स्वमात्मानं द्विजोत्तम ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
ततः स्वय़ंवरं देव्याः पाञ्चाल्याः पर्व चोच्यते ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४
नारद उवाच
ततः स्वय़ंवरे तस्मिन्सम्प्रवृत्ते महोत्सवे |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
ततः स्वय़म्भुवा ध्यातस्तत्र वह्निर्महात्मना |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
ततःप्रभृति चाप्यग्निः शमीगर्भेषु दृश्यते |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
गङ्गो उवाच
ततःप्रभृति चाप्येतज्जातरूपमुदाहृतम् |
७९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
ततक्ष कर्णं वहुभिः शरोत्तमै; र्विभेद मर्मस्वपि चार्जुनस्त्वरन् ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
ततक्षतुर्महेष्वासौ शरैरन्योन्यमाहवे ||
१० ग
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
ततक्षतुर्मृधेऽन्योन्यं शृङ्गाभ्यां वृषभाविव ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
ततक्षुः साय़कैस्तीक्ष्णैर्निघ्नन्तो हि परस्परम् ||
६० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
ततक्षुश्चिच्छिदुश्चान्ये विभिदुश्चिक्षिपुस्तथा |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततश्च कृतवर्माणं विद्धि राजञ्जनाधिपम् |
७५ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततश्च नैमिषं गच्छेत्पुण्यं सिद्धनिषेवितम् |
५३ क