chevron_left  ततश्चिन्तापरोarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
ततश्चिन्तापरो राजा वभूव जनमेजय़ः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
ततश्चिन्तामुपगतः शक्रः कथमय़ं द्विजः |
९ क
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
ततश्चिन्तय़मानस्य गुडाकेशस्य धीमतः |
२ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततश्चीरवतीं गच्छेत्पुण्यां पुण्यतमैर्वृताम् |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
ततश्चीराजिनधरं कृशमुच्चमतीव च |
६ क
वन पर्व
अध्याय ९५
लोमश उवाच
ततश्चीराणि जग्राह वल्कलान्यजिनानि च |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
ततश्चुक्रोध वलवांश्चक्रे वेगं च संय़ुगे ||
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
ततश्चूडामणिं निष्कमङ्गदे कुण्डलानि च |
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततश्चेदिपतेः श्रुत्वा भीष्मः स कटुकं वचः |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततश्चेदिपतेर्देहात्तेजोऽग्र्यं ददृशुर्नृपाः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
ततश्चेदिपतेर्वाक्यं तच्छ्रुत्वा कुरुसत्तमः |
२० क
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
ततश्चेदिपुरं प्राप्तौ सङ्कर्षणजनार्दनौ |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
ततश्चेदिपुरीं रम्यां सुदेवो नाम वै द्विजः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततश्चैडविडाल्लेभे धुन्धुमारो जनेश्वरः |
७५ क
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
ततश्चोरक्षय़ं कृत्वा द्विजेभ्यः पृथिवीमिमाम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
ततश्चोर्ध्वस्थितो धीमानभवद्भरतर्षभ ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
ततश्छत्रं ध्वजं चैव छित्त्वा राज्ञोऽर्जुनः शरैः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततश्छित्त्वा कवचं दिव्यमङ्गा; त्तथैवार्द्रं प्रददौ वासवाय़ |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
ततश्छिन्नाय़ुधं तेन रणे पञ्च महारथाः |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
ततश्छेत्स्यामि ते पाशं प्राप्ते साधारणे भय़े ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
ततस्तं कलशं दृष्ट्वा जलपूर्णं स पार्थिवः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १७१
वसिष्ठ उवाच
ततस्तं क्रोधजं तात और्वोऽग्निं वरुणालय़े |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
भीष्म उवाच
ततस्तं तापसा दृष्ट्वा स च राजा महातपाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं तीव्रतपसं कृशं धमनिसन्ततम् |
९० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
ततस्तं दर्भविन्यासं भित्त्वा सुरुचिराङ्गदः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
ततस्तं देवा अनु विप्लवन्ते; अतो मृत्युर्मरणाख्यामुपैति |
८ क
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तं देशमागम्य कृतकर्मा विभीषणः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
ततस्तं नातिमनसं समुदीक्ष्याहमव्रुवम् |
९ क
सभा पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं निश्चितात्मानं युद्धाय़ यदुनन्दनः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तं निहतं दृष्ट्वा धूम्राक्षं राक्षसोत्तमम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं नृपतिश्रेष्ठं चातुर्वर्ण्यहितेप्सय़ा |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
ततस्तं नृपशार्दूलं शार्दूलसमविक्रमम् |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
ततस्तं पतितं भूमौ नाराचेन समाहतम् |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं पाण्डवो राजा करे पस्पर्श पाणिना |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
ततस्तं पितरस्तात विज्ञाय़ भृगुसत्तमम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तं पुत्रशोकेन भृशं पीडितमानसम् |
८३ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं पृष्ठतो राजञ्शाल्वराजो महारथः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तं प्रत्युवाचाथ मारीचो राक्षसेश्वरम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
ततस्तं प्रेषय़ामास राजा गौरमुखं तदा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
ततस्तं भगवान्धर्मो यज्ञं याजय़त स्वय़म् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
ततस्तं मणिभद्रस्तु पुनर्वचनमव्रवीत् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तं मारुतं घोरं स्वय़म्भूर्मनुजाधिप |
७६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
ततस्तं मेघसङ्काशं दीप्तास्यं दीप्तकुण्डलम् |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
ततस्तं यौवराज्येन स्थापय़ित्वा प्रतर्दनम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
ततस्तं रथनिर्घोषं नलाश्वास्तत्र शुश्रुवुः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
ततस्तं रथमास्थाय़ देवाप्याय़ितमाहवे |
५ क
वन पर्व
अध्याय २५६
भीमसेन उवाच
ततस्तं रथमास्थाय़ भीमः पार्थानुगस्तदा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
ततस्तं लुव्धकः पश्यन्कृपय़ाभिपरिप्लुतः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं वचनं प्राह ज्येष्ठो धर्मात्मजः प्रभुः |
२ क
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तं वरदं शूरं युवानं मृष्टकुण्डलम् |
३ क