आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं वारणं क्रुद्धः शरजालेन पाण्डवः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
ततस्तं विरथं कृत्वा सात्यकिः सत्यविक्रमः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तं विह्वलं ज्ञात्वा पुत्रस्तव विशां पते |
६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
ततस्तं वुवुधे देवः शक्रो वलनिषूदनः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं वृत्रसङ्काशं भीमो मल्लं समाह्वय़त् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तं वैष्णवे शूरं नक्षत्रेऽभिमतेऽहनि |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं व्राह्मणं तत्र भार्यया च सुतेन च |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तं व्राह्मणं ताभ्यां धर्मव्याधो न्यवेदय़त् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
ततस्तं व्राह्मणं दृष्ट्वा पुनरेव महाय़शाः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तं शरवर्षेण महता समवाकिरत् |
१२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं शितिकण्ठाय़ रुद्राय़र्षभकेतवे |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
ततस्तं षडधिष्ठानं गर्भमेकत्वमागतम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
ततस्तं संवृणोत्येव तमतीत्य च वर्धते ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
ततस्तं सत्कृतं सर्वैः सदस्यैर्जनमेजय़ः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
ततस्तं समुपास्थाय़ कृत्या सृष्टा महात्मना |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं हृष्टमनसं पाण्डवान्प्रति भारत |
३२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
ततस्तक्षशिलाय़ाः स पुनराय़ाद्गजाह्वय़म् ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
ततस्तच्छस्त्रवित्रस्ता उत्पतन्तो भय़ातुराः |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
ततस्तच्छुश्रुवुः सर्वे नारदस्य वचो महत् |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
ततस्ततः शमं लव्ध्वा सुगतिं विन्दते वुधः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
ततस्ततः शरैर्द्रोणमपाकर्षत पार्षतः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ततस्ततः संनतिमेव जग्मु; र्न तं प्रतीपोऽभिससार कश्चित् ||
११६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
ततस्ततः स्रवते वुद्धिरस्य; छिद्रोदकुम्भादिव नित्यमम्भः ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
ततस्ततो निय़म्यैतदात्मन्येव वशं नय़ेत् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
ततस्ततो मुखं चारु मम देवि विनिर्गतम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ततस्ततोऽपातय़त योधाञ्शतसहस्रशः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तत्कथय़ामास यथादृष्टं धनञ्जय़ः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तत्कारणं ज्ञात्वा कृत्स्नं चैवमशेषतः |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तत्कुञ्जरानीकं व्यधमद्धृष्टमार्जुनिः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
ततस्तत्कौरवं सैन्यं धिक्कृत्वा तु युधिष्ठिरम् |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
ततस्तत्क्षीय़ते चैव पुनश्चान्यत्प्रचीय़ते |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
ततस्तत्तादृशं दृष्ट्वा स एव भगवानृषिः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२८६
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तत्त्वमिति ज्ञात्वा राधेय़ः परवीरहा |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तत्परमाश्चर्यं विचित्रं महदद्भुतम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
ततस्तत्पाण्डवं सैन्यं संसुप्तं शिविरे निशि |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तत्पुनरावृत्तं युधिष्ठिरवलं महत् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तत्पुनरावृत्तं युधिष्ठिरवलं महत् |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
ततस्तत्पुनरावृत्तं युधिष्ठिरवलं महत् |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
ततस्तत्प्रतिघातार्थं व्राह्ममेवास्त्रमुत्तमम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
ततस्तत्प्राद्रवत्सैन्यं हतभूय़िष्ठमातुरम् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
ततस्तत्र द्विजा राजंस्तापसाश्च वनौकसः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
ततस्तत्र महानासीद्व्राह्मणः संशितव्रतः |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तत्र समाजग्मुस्तापसा विविधव्रताः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तत्र समाप्लुत्य गात्राणि सगणो नृपः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तत्राप्युपस्पृश्य दत्त्वा च विविधं वसु |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तत्रैव रामस्य समासीनस्य तैः सह |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तत्सञ्जय़ः सर्वं गत्वा नागाह्वय़ं पुरम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तत्सञ्जय़स्तस्मै सर्वमेव न्यवेदय़त् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तत्सर्वमाचख्यौ कुरूणां वैशसं महत् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
ततस्तत्सर्वमाचख्यौ नारदो मातलिं प्रति ||
२२ ख